बेतुल
बैतूल शाहपुर तहसील के गुरगुन्दा मैं आखिर कौन है रिंकू अरशद और अहमद जो कोयले के कारोबार को अंजाम दे रहे हैं

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बैतूल शाहपुर गुरगुन्दा के आसपास का इलाका लंबे समय से “काले सोने” यानी अवैध कोयला कारोबार की वजह से चर्चा में रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह काम छोटे स्तर पर नहीं बल्कि संगठित नेटवर्क की तरह चलता है — जिसमें खनन, भंडारण, परिवहन और बिक्री तक पूरी चैन बनी हुई है।
मौके से जुड़ी स्थानीय रिपोर्टों और चर्चाओं के अनुसार, जंगल और पहाड़ी इलाकों में रात के समय गड्ढे खोदकर कोयला निकाला जाता है। फिर उसे ट्रैक्टर-ट्रॉली, पिकअप और छोटे ट्रकों से ईंट भट्टों, ढाबों और अन्य औद्योगिक उपयोगों के लिए भेजा जाता है। कई बार यह परिवहन ग्रामीण सड़कों और नदी किनारों से कराया जाता है ताकि मुख्य मार्गों और चेकपोस्ट से बचा जा सके।
स्थानीय लोगों के आरोपों में अक्सर तीन बातें सामने आती हैं:
स्थानीय स्तर पर संरक्षण
लोगों का दावा है कि बिना सूचना तंत्र द्वारा इसके पूर्व भी इन लोगो पर मामले बने है पूर्व कलेक्टर नें इन्ही लोगो के ऊपर जुर्माना कियाऔर मामले भी बने आखिर के लोग बाहर से आकर इस जिले में बसे हुए हैं जहां आदिवासी बाहुल्य जिले इनका नेटवर्क इतना तगड़ा पहले हुआ है कि शासन प्रशासन को भी ताक में रखते हैं आखिर किन लोगों का संरक्षण मिल रहा है जो अपना कारोबार इतना फैला हुआ है कि इनका कोई कुछ नहीं कर पा रहा है बिना किसी संरक्षण के इतना बड़ा नेटवर्क लगातार चल पाना मुश्किल है। आरोप लगाए जाते हैं कि कुछ प्रभावशाली लोग, स्थानीय बिचौलिए और कथित “कोयला माफिया” इस धंधे को संचालित करते है
कार्रवाई और फिर कारोबार शुरू
कई बार प्रशासन वाहन पकड़ता है, कोयला जब्त करता है या छापेमारी करता है, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर वही गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। यही वजह है कि लोगों में यह धारणा बनी है कि कार्रवाई केवल दिखावे की होती है।
राजस्व और पर्यावरण को नुकसान
अवैध खनन से सरकार को करोड़ों का नुकसान होता है। साथ ही जंगल, जमीन और जल स्रोत भी प्रभावित होते हैं। कई जगह अवैध खुदाई के कारण हादसों का खतरा बढ़ जाता है। देश के दूसरे कोयला क्षेत्रों में अवैध खदान धंसने जैसी घटनाएं भी सामने आती रही हैं।
पाथाखेड़ा बेल्ट में पहले भी अवैध कोयला परिवहन और खदानों को लेकर शिकायतें उठती रही हैं। स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि गुरगुन्दा, चोपना, सारणी और शाहपुर क्षेत्र में सक्रिय नेटवर्क छोटे मजदूरों का इस्तेमाल करता है, जबकि असली कमाई ऊपर तक जाती है



