गाजियाबाद

थानों से उठता भरोसा, आत्मदाह तक पहुंचता आक्रोश 

आखिर लोनी और अंकुर विहार पुलिस पर क्यों उठ रहे सवाल?

न्याय की जगह अविश्वास का माहौल, पीड़ितों को दूसरे थानों से जांच की मांग तक करनी पड़ रही
नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : गाजियाबाद के लोनी और अंकुर विहार थाना क्षेत्र में पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। हालात ऐसे बनते दिखाई दे रहे हैं कि आम आदमी अब स्थानीय पुलिस पर भरोसा करने के बजाय दूसरे थानों से जांच कराने की मांग करने लगा है। यह स्थिति सिर्फ पुलिस व्यवस्था पर सवाल नहीं खड़े करती, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्याय व्यवस्था की जमीनी हकीकत भी उजागर करती है।
ताजा मामला जीआरपी शामली में तैनात हेड कांस्टेबल सुभाष बंसल का है, जिन्होंने आरोप लगाया है कि उनके साथ हुई गंभीर मारपीट की घटना में लोनी पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई नहीं कर रही। इतना ही नहीं, उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि पांच दिन के भीतर न्यायसंगत कार्रवाई नहीं हुई तो वह परिवार सहित लोनी थाने की चिरौड़ी चौकी पर आत्मदाह करेंगे। इस घोषणा के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मचा हुआ है।
सवाल यह है कि आखिर कोई व्यक्ति आत्मदाह जैसी भयावह चेतावनी देने को क्यों मजबूर होता है? क्या यह केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया है या फिर व्यवस्था से टूटते विश्वास की तस्वीर?
पीड़ित सुभाष बंसल का आरोप है कि पुलिस  मुकदमा में पीड़ित को आई  गंभीर चोटों की धाराओं को शामिल करने के बजाय समझौते का दबाव बना रही है। हालांकि चौकी प्रभारी ने इन आरोपों को गलत बताते हुए कहा है कि मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद संबंधित धाराएं मुकदमे में बढ़ाई जाएंगी। लेकिन जब पीड़ित खुद थाना पुलिस पर भरोसा नहीं जता रहा और विवेचना दूसरे थाने मोदीनगर या मुरादनगर से कराने की मांग कर रहा है, तो यह स्थिति अपने आप में बहुत कुछ बयान करती है।
दरअसल, यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले गाजियाबाद विकास प्राधिकरण से जुड़े एक विवाद में अंकुर विहार थाना क्षेत्र में दर्ज मुकदमे ने भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए थे। उस मामले में नामजद आरोपियों ने पुलिस कमिश्नर से मिलकर मुकदमे को “षड्यंत्र” बताते हुए जांच दूसरे थाने से कराने की मांग की थी। आश्चर्य की बात यह रही कि पुलिस अधिकारियों ने मामले में “झोल” मानते हुए विवेचना मोदीनगर पुलिस को ट्रांसफर कर दी।
अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर बार-बार ऐसे हालात क्यों बन रहे हैं कि स्थानीय थानों की जांच पर ही संदेह खड़ा हो जाता है? क्या थाना स्तर पर निष्पक्षता की कमी है? क्या राजनीतिक या स्थानीय दबाव पुलिस कार्रवाई को प्रभावित कर रहे हैं? या फिर पुलिस और जनता के बीच संवाद और विश्वास पूरी तरह कमजोर हो चुका है?
यदि हर संवेदनशील मामले में विवेचना दूसरे थानों को ट्रांसफर करनी पड़े, तो यह स्थानीय पुलिस व्यवस्था की कार्यक्षमता और विश्वसनीयता दोनों पर गंभीर टिप्पणी मानी जाएगी। अधिकारियों को इस पर गंभीर विषय पर मंथन करना होगा कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आ रही है और जनता का भरोसा वापस कैसे जीता जाए।
कानून व्यवस्था केवल मुकदमे दर्ज करने से नहीं चलती, बल्कि जनता के मन में निष्पक्षता का विश्वास कायम रखने से चलती है। यदि एक पुलिसकर्मी तक खुद को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस कर रहा है, तो आम नागरिक की मनःस्थिति सहज ही समझी जा सकती है।
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