बागपत
भोले के भक्तों की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा
कांवड़ यात्रा में श्रद्धा के साथ स्वास्थ्य का संदेश दे रहे डॉ. तरुण तोमर और डॉ. शश्या तोमर

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बड़ौत/बागपत : सावन की फुहारों के बीच जब “बोल बम” और “हर-हर महादेव” के जयघोष से पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है, जब नंगे पांव, कंधों पर कांवड़ उठाए लाखों शिवभक्त अपनी आस्था की डोर थामे कई किलोमीटर की कठिन यात्रा तय करते हैं, तब यह यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं रह जाती, बल्कि विश्वास, त्याग, तपस्या और मानव सेवा का जीवंत स्वरूप बन जाती है।
इसी पवित्र भावना के साथ मेडिसिटी हॉस्पिटल, कोताना रोड, बड़ौत के कैंसर विशेषज्ञ डॉ. तरुण तोमर और नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शश्या तोमर शिवभक्तों के लिए स्वास्थ्य जागरूकता का संदेश दे रहे हैं। उनका कहना है कि महादेव की भक्ति तभी पूर्ण होती है, जब श्रद्धालु अपने शरीर का भी उतना ही सम्मान करें, जितना अपनी आस्था का करते हैं।
“हर कांवड़िया मेरे लिए एक मरीज नहीं, महादेव का अतिथि है” — डॉ. तरुण तोमर
कैंसर विशेषज्ञ डॉ. तरुण तोमर ने भावुक होते हुए कहा कि जब वे कांवड़ियों को तपती सड़क पर नंगे पांव चलते देखते हैं, तो उन्हें केवल श्रद्धालु नहीं, बल्कि अद्भुत संकल्प और अटूट विश्वास की मिसाल दिखाई देती है।
उन्होंने कहा, “जो व्यक्ति भगवान शिव के नाम पर अपने शरीर की सारी थकान भूलकर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर सकता है, उसका स्वास्थ्य सुरक्षित रखना भी हमारा कर्तव्य है। यदि किसी श्रद्धालु की समय पर मदद हो जाए, उसका दर्द कम हो जाए या उसकी जान बच जाए, तो वही हमारे लिए भगवान शिव का सबसे बड़ा आशीर्वाद है।”
उन्होंने बताया कि कांवड़ यात्रा के दौरान कई श्रद्धालु अत्यधिक थकान, पानी की कमी, चक्कर, संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करते हैं। ऐसे में थोड़ी-सी सावधानी बड़ी परेशानी से बचा सकती है।
उन्होंने सभी शिवभक्तों से अपील की कि वे पर्याप्त पानी पीते रहें, समय पर विश्राम करें, संतुलित भोजन लें और किसी भी गंभीर लक्षण को नजरअंदाज न करें।
“इन आंखों से ही तो बाबा के दर्शन होते हैं” — डॉ. शश्या तोमर
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शश्या तोमर ने कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान धूल, धूप और लगातार सफर के कारण आंखों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने भावुक शब्दों में कहा, “जब कोई शिवभक्त पहली बार गंगाजल लेकर शिवालय में पहुंचता है और नम आंखों से भोलेनाथ के दर्शन करता है, उस पल की खुशी शब्दों में नहीं बताई जा सकती। इसलिए आंखों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है जितनी यात्रा की तैयारी।”
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि धूल और तेज धूप से आंखों को बचाएं, आंखों को गंदे हाथों से न छुएं और किसी भी परेशानी पर तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लें।
डॉक्टर नहीं, मानवता के प्रहरी
दोनों चिकित्सकों का मानना है कि डॉक्टर का असली परिचय उसकी डिग्री से नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता से होता है। अस्पताल की चारदीवारी से बाहर निकलकर समाज को जागरूक करना, लोगों को स्वस्थ रहने की प्रेरणा देना और जरूरतमंद की मदद करना ही चिकित्सा सेवा का वास्तविक उद्देश्य है।
उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा में सेवा कर रहे पुलिसकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी, स्वयंसेवी संगठन, भंडारा समितियां और आम नागरिक भी किसी तपस्वी से कम नहीं हैं। जो व्यक्ति थके हुए कांवड़िए को पानी का एक गिलास पिलाता है, उसके पैरों की मरहम-पट्टी करता है या उसे छांव देता है, वह भी भगवान शिव की सच्ची आराधना कर रहा होता है।
“श्रद्धा के साथ सावधानी भी जरूरी”
दोनों चिकित्सकों ने सभी कांवड़ियों से अपील की कि यात्रा के दौरान जल्दबाजी न करें, यातायात नियमों का पालन करें, पर्याप्त आराम करें और किसी भी बीमारी को छिपाने के बजाय तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें।
उन्होंने कहा, “महादेव अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं, लेकिन यह नहीं चाहते कि उनका भक्त लापरवाही के कारण कष्ट उठाए। सुरक्षित रहिए, स्वस्थ रहिए और शिवभक्ति की इस पावन यात्रा को आनंद और अनुशासन के साथ पूरा कीजिए।”
कांवड़ यात्रा केवल गंगाजल लाने की यात्रा नहीं है, यह इंसान के भीतर छिपे विश्वास, धैर्य और समर्पण की यात्रा है। इस यात्रा में जहां एक ओर शिवभक्त अपने कदमों से भक्ति का इतिहास लिखते हैं, वहीं दूसरी ओर समाज के कुछ लोग सेवा का ऐसा अध्याय रचते हैं जो हमेशा याद रखा जाता है।
डॉ. तरुण तोमर और डॉ. शश्या तोमर ऐसे ही चिकित्सक हैं, जिनके लिए मरीज केवल एक फाइल या रिपोर्ट नहीं, बल्कि किसी मां की उम्मीद, किसी पिता का सहारा, किसी बच्चे की मुस्कान और किसी परिवार की पूरी दुनिया होता है।
जब डॉक्टर अपने सफेद कोट के साथ संवेदनाओं का दामन भी थाम लेता है, तब चिकित्सा केवल इलाज नहीं रहती, बल्कि ईश्वर की सबसे पवित्र सेवा बन जाती है।
सावन के इस पावन अवसर पर इन दोनों चिकित्सकों का संदेश केवल स्वास्थ्य सलाह नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और सेवा का ऐसा प्रेरक संदेश है, जो हर शिवभक्त के हृदय को यह एहसास कराता है कि “महादेव तक पहुंचने का सबसे सुंदर मार्ग, किसी पीड़ित के दर्द को कम करना और किसी थके हुए यात्री को सहारा देना है।”



