
हापुड़ : श्रावण शिवरात्रि का जलाभिषेक 23 जुलाई को सुबह 5 बजकर 39 मिनट से प्रारम्भ होगा भारतीय ज्योतिष कर्मकांड महासभा द्वारा चलाए जा रहे नशामुक्त हो कावड़ यात्रा अभियान के तहत लगभग सभी प्रमुख शिव मंदिरों में कावड़ यात्रा , जलाभिषेक, पूजन से सम्बंधित क्या करें -क्या ना करें नियम के फ्लैक्सी लगाए गए है जिसकी जानकारी शिवभक्त ले रहे है महासभा अध्यक्ष ज्योतिर्विद पंडित के सी पाण्डेय ने बताया कि चतुर्दशी तिथि 23 जुलाई को सुबह 4.39 बजे से शुरु होकर देर रात्रि 2.29 तक रहेगा श्रावण कृष्ण चतुर्दशी तिथि गजकेशरी योग के साथ सूर्योदय 5.39 से शुरु होगा जिसमें कावड़िये भोलेनाथ का जलाभिषेक करेंगे पंडित के0 सी0 पाण्डेय ने बताया कि पूर्ण श्रद्धा से कठिन परिश्रम कर कावड़ ला रहे भक्तों का मनोरथ सिद्ध हो और पूर्ण शुभ फल प्राप्त हो इसके लिए महासभा द्वारा धर्मग्रंथों के अनुरूप अनेक माध्यमों से जलाभिषेक पूजन विधि का मार्गदर्शन किया जा रहा है उन्होंने कहा कि प्रसिद्ध सबली महादेव मंदिर, दतियाना शिव मंदिर, असरा शिव मंदिर, सिद्ध श्री चंडी मंदिर सहित हापुड़ के 50 से अधिक मंदिरों एवं स्थानों पर जलाभिषेक मार्गदर्शन फ्लैक्सी लगाया गया है
कांवड जलाभिषेक पूजन के पूर्ण शुभफल प्राप्ति के लिए नियम :
क्या करें:-
गंगा स्नान कर शुद्ध मन से जलाभिषेक का संकल्प करें।
गंगा जल किसी धातु अथवा, मिट्टी के बर्तन में लाना चाहिए।
गंगा जल चढ़ाने के पूर्व तक निराहार फलाहार व्रत रहना चाहिए।
कांवड यात्रा के समय त्रिपुण्ड (चंदन) लगाकर, रूद्राक्ष धारण करना चाहिए तथा ॐ नमः शिवाय या ॐ नमो नीलकण्ठाय का जप मन में निरंतर करना चाहिए।
जलाभिषेक सर्वप्रथम क्रमशः गणेश जी, कार्तिकेय जी, नन्दी जी, पार्वती जी और अन्त में शिवलिंग पर करना चाहिए।
जलाभिषेक उत्तर मुख होकर बैठकर या झुककर करना चाहिए।
मनोकामना सिद्धि के लिए दीपक जलाकर प्रार्थना करना चाहिए।
जलाभिषेक पूजन के बाद ब्राह्मण भोजन व दान अवश्य करना चाहिए।
क्या ना करें :
धर्म ग्रन्थो के अनुसार किसी भी प्रकार का नशा नहीं करना चाहिए।
कांवड जल उठाने के बाद जल चढ़ाने तक भूमि पर नहीं रखना चाहिए।
किसी पर क्रोध, दुर्व्यहार तथा अपशब्द भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
अश्लील वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए तथा अश्लील गीत व नृत्य भी नहीं करना चाहिए।
शंख से जलाभिषेक नहीं करना चाहिए तथा हल्दी रोली तुलसी पत्र भी नहीं चढ़ाना चाहिए।
स्त्रियों को खुले बाल नहीं रखने चाहिए तथा शिवलिंग का स्पर्श भी नहीं करना चाहिए।
कांवड यात्रा के समय धार्मिक एवं वैधानिक नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
जलाभिषेक के बाद कांवड़ को इधर-उधर नहीं फेंकना :
भगवान शिव के पूजन में गंगाजल, विल्वपत्र, आँक (मदार) के पुष्प, फल व पत्ते, शमी पुष्प व पत्ते, धतूरा, सफ़ेद व पीले पुष्प, सफ़ेद मिष्ठान, दूध, गन्ने का रस, अक्षत (बिना टूटे चावल), गेहूँ, तिल, दही, शहद, देशी घी, तुलसी की मंजरी, दूर्वा आदि अवश्य चढ़ाना चाहिए,
कावड़ के धार्मिक महत्व को बताते हुए पंडित के0 सी0 पाण्डेय ने बताया कि धर्मग्रंथो व श्रुतियों के अनुसार समुद्रमंथन के बाद निकले हलाहल विष को सृष्टि रक्षा हेतु भगवान भोलेनाथ ने पी लिया था विष की गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं ने जलाभिषेक किया एक अन्य कथा अनुसार हत्या के पाप से निवृति के लिए भगवान परशुराम जी द्वारा बागपत स्थित पूरा महादेव का जलाभिषेक किया गया, भगवान श्री राम ने भी कावड़ जलाभिषेक किया था तथा रावण द्वारा भी जलाभिषेक का वर्णन मिलता है स्कन्दपुराण, शिवपुराण, लिंगपुराण, नारदसंहिता आदि धर्मग्रंथों का उदाहरण देते हुए कि पुत्र प्राप्ति के लिए दूध से, प्रेम के लिए दही से, मैत्री व शांति के लिए घी से दांपत्य जीवन सुखमय के लिए शक्कर मिश्रित दूध का, धनके लिए शहद से, व्यापार वृद्धि व धन प्राप्ति के लिए गन्ने का रस से, रोग नाश के लिए गिलोय से तथा विद्या प्राप्त करने के लिए गंगाजल से भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करना चाहिए।



