
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
असम के कर्बी आंगलोंग और वेस्ट कर्बी आंगलोंग जिलों में पिछले कुछ दशकों से पर्यावरणीय तबाही मची हुई है। हालिया सैटेलाइट अध्ययनों से खुलासा हुआ है कि जंगलों का आवरण तेजी से सिकुड़ रहा है, जबकि मानवीय दबाव भूमि संसाधनों पर बढ़ता जा रहा है। जानकारी के अनुसार कर्बी आंगलोंग असम के सबसे प्रभावित क्षेत्रों में शुमार है, जहां 2001 से 2020 के बीच कुल जंगली क्षेत्र का लगभग 12% यानी 97,400 हेक्टेयर वृक्ष आवरण लुप्त हो गया। 2013 से 2023 के बीच यह गिरावट और गंभीर हुई, जिसमें करीब 108.56 वर्ग किमी जंगल कम हो गया। इस दौरान कृषि भूमि 26.69 वर्ग किमी बढ़ी और निर्मित क्षेत्र 30 वर्ग किमी से अधिक फैला। विशेषज्ञों का मानना है कि ये परिवर्तन जनसांख्यिकीय वृद्धि से प्रेरित हैं। 2011 में 9.5 लाख की आबादी 2025 तक बढ़कर 11 लाख हो गई, जिससे आवास और खेती के लिए जंगलों पर दबाव पड़ा। अवैध कटाई ने समस्या को और गहरा किया। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अनुमत सीमा से अधिक 8 मिलियन घन मीटर पत्थर का खनन हुआ, साथ ही बड़े पैमाने पर लकड़ी तस्करी जारी है। अध्ययनों से पता चलता है कि घने जंगल अब खंडित होकर क्षयग्रस्त और खुले इलाकों में बदल रहे हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा है। 2000 से 2023 के बीच असम में 1,400 से अधिक मानव मौतें और 1,200 हाथी हताहत हुए। स्थानीय निवासी बताते हैं कि कभी घने जंगल पतले पड़ गए हैं और नदियां सूखने लगी हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही रुझान जारी रहा, तो मिट्टी कटाव, जल संकट और जैव विविधता ह्रास जैसे गंभीर परिणाम होंगे। 1970 के दशक से चली आ रही मानवीय गतिविधियों ने इस समृद्ध पारिस्थितिकी को तबाह कर दिया है। संरक्षण प्रयासों के बावजूद विकास और पर्यावरण संतुलन चुनौती बना हुआ है।



