ललितपुर
ललितपुर गिद्ध संरक्षण की नई शरणस्थली

नेशनल प्रेस टाइम्स,, ब्यूरो
ललितपुर। बुन्देलखण्ड की पहचान अब सिर्फ किलों और चट्टानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गिद्धों का सुरक्षित आश्रय स्थल भी बन रहा है। उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले की भौगोलिक संरचना, ऊंची चट्टानें और प्राचीन वृक्ष इन संकटग्रस्त पक्षियों के लिए जीवन रेखा साबित हो रहे हैं। बतातें चलें कि सितम्बर के प्रथम सप्ताह में मनाया जाता है अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस। इस बार भी समाजसेवियों ने आनलाइन कार्यशाला के माध्यम से जागरूकता फैलाई।
पांच प्रमुख प्रजातियां दर्ज
सर्वेक्षणों में अब तक दीर्घचुंच गिद्ध, सफेद पीठ गिद्ध, गोबर गिद्ध, राज गिद्ध और यूरेशियन पांडुर गिद्ध की स्थायी उपस्थिति दर्ज की गई है। कभी-कभी हिमालयी पांडुर और श्याम गिद्ध भी दिखते हैं। सर्दियों में यहाँ प्रवासी गिद्धों की संख्या बढ़कर करीब 500 तक पहुँच जाती है।
प्रकृति के सफाईकर्मी
गिद्ध मृत पशुओं को खाकर संक्रमण रोकते हैं, इसलिए इन्हें प्रकृति के सफाईकर्मी कहा जाता है। भारत में डिक्लोफेनाक दवा के कारण गिद्धों की संख्या 90त्न तक घट चुकी थी, लेकिन अब संरक्षण प्रयासों से सुधार दिख रहा है।
सबसे बड़ा खतरा खनन
ललितपुर की चट्टानें गिद्धों के बसेरे हैं, लेकिन चूना पत्थर और ग्रेनाइट की खदानें इनके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रही हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर खनन यूँ ही जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में इन चट्टानों पर सिर्फ सन्नाटा बचेगा।
समाधान और जनपहल
विशेषज्ञों का मानना है कि खनन पर नियमन, और पीपल, बरगद, सेमल, सिरीस जैसे वृक्षों का रोपण गिद्ध संरक्षण की कुंजी है। इंडियन बायोडायवर्सिटी कंज़र्वेशन सोसाइटी और मानव ऑर्गेनाइजेशन धरातल और ऑनलाइन दोनों स्तरों पर अभियान चला रहे हैं। ग्रामीणों और छात्रों को जोड़ा जा रहा है, घायल गिद्धों का इलाज कर उन्हें वापस छोड़ा जा रहा है।
संस्कृति और चेतना
गिद्धों का उल्लेख बुंदेलखंड की लोककथाओं और महाकाव्यों में संरक्षक और बलिदानी रूप में मिलता है। आज यही पक्षी संरक्षण की गुहार कर रहे हैं।
भविष्य की राह
अगर संरक्षण की पहलें जारी रहीं और खनन पर नियंत्रण लगा, तो ललितपुर उत्तर भारत का गिद्ध संरक्षण केंद्र बन सकता है। यहाँ ईको-पर्यटन की भी अपार संभावनाएँ हैं।
विशेषज्ञों की राय
डा. सोनिका कुशवाहा का कहना है कि गिद्ध प्रकृति की बायोलॉजिकल सफाई मशीन हैं, इनके आवास बचेंगे तो ये खुद अपनी संख्या सँभाल लेंगे। वहीं पुष्पेन्द्र सिंह चौहान (मानव ऑर्गेनाइजेशन) का कहना है कि अगर खनन रोका जाए और वृक्षारोपण को जनांदोलन बनाया जाए, तो गिद्ध संरक्षण ललितपुर की नई पहचान बनेगा और युवाओं के लिए रोजगार का स्रोत भी।
मुहिम से जुड़ें
इंडियन बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन सोसाइटी और मानव ऑर्गेनाइजेशन ने गिद्ध बचाओ अभियान शुरू किया है। कोई भी व्यक्ति अपनी कहानी, पोस्टर या विचार ऑनलाइन भेजकर इसका हिस्सा बन सकता है। यह अभियान 10 सितंबर 2025 तक जारी रहेगा।