बागपत
प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर – चाइल्ड हेल्पलाइन वंदना गुप्ता (पूर्व समाजसेवी)

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
प्रश्न 1 : वंदना जी, आप पहले समाज सेवा से जुड़ी रहीं और अब चाइल्ड हेल्पलाइन प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर के रूप में कार्य कर रही हैं। इस सफर को कैसे देखती हैं?
वंदना गुप्ता : समाज सेवा हमेशा से मेरे जीवन का हिस्सा रही है। पहले मैंने अपनी व्यक्तिगत पहल पर जरूरतमंदों की मदद की, लेकिन अब सरकारी व सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर बच्चों के लिए एक सशक्त मंच पर काम कर रही हूँ। यह सफर मुझे और जिम्मेदारी के साथ काम करने की प्रेरणा देता है।
प्रश्न 2 : चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 की भूमिका को आप कैसे समझाती हैं?
वंदना गुप्ता : 1098 बच्चों के लिए जीवन रेखा है। कोई भी बच्चा संकट में हो – चाहे बाल विवाह, बाल श्रम, घरेलू हिंसा, अनाथ अवस्था या अन्य किसी शोषण की स्थिति – वह इस नंबर के ज़रिए तुरंत मदद पा सकता है। हमारी टीम 24 घंटे सक्रिय रहती है और जिला प्रशासन के साथ मिलकर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
प्रश्न 3 : “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” और “बालिका सुरक्षा कवच” जैसे अभियानों में आपकी क्या भूमिका रहती है?
वंदना गुप्ता : इन अभियानों के ज़रिए हम स्कूल–कॉलेजों में जाकर बेटियों को आत्मरक्षा के उपाय, हेल्पलाइन नंबर और सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ जागरूक करना नहीं, बल्कि बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करना भी है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की बच्चियां जब खुद से बोलने लगती हैं, तो यह हमारी सबसे बड़ी सफलता होती है।
प्रश्न 4 : आपके अनुसार वर्तमान समय में बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
वंदना गुप्ता : सबसे बड़ी चुनौती है – जागरूकता की कमी। आज भी कई बच्चे और उनके माता–पिता सरकारी योजनाओं और अधिकारों से अनजान हैं। इसके अलावा सोशल मीडिया और गलत संगत भी बच्चों को प्रभावित कर रही है। हमें परिवार और समाज दोनों स्तर पर बच्चों को सही मार्गदर्शन देना होगा।
प्रश्न 5 : एक समाजसेवी और अब प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर के रूप में आपका व्यक्तिगत सपना क्या है?
वंदना गुप्ता : मेरा सपना है कि कोई भी बच्चा असुरक्षित महसूस न करे। हर बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान मिले। अगर आने वाले वर्षों में हम बच्चों में यह विश्वास जगा पाए कि “हम अकेले नहीं हैं”, तो यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
संवाददाता की टिप्पणी (सुरेंद्र मलानिया)
वंदना गुप्ता का यह जज़्बा बताता है कि बदलाव सिर्फ नीतियों से नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर कार्य करने वालों की निष्ठा से आता है। समाजसेवा से लेकर चाइल्ड हेल्पलाइन तक का उनका सफर यह साबित करता है कि अगर इरादे मजबूत हों तो बदलाव ज़रूर होता है।



