गाजियाबाद

तिरंगे के साये में तंज़ की तिरछी उड़ान

झंडोत्तोलन बना आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा

अंकुर बिहार में ‘विकास’ नहीं, ‘विकास प्राधिकरण की कृपा’ चर्चा में; व्हाट्सएप से लोनी तक गर्माई सियासत
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : आज़ादी का जश्न मनाने के लिए सजे झंडोत्तोलन कार्यक्रम में जब तिरंगा फहराया गया, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि हवा में देशभक्ति से ज़्यादा आरोपों की गूंज तैरने लगेगी। नगरपालिका परिषद के पूर्व चेयरमैन मनोज धामा ने मंच से ऐसा बम फोड़ा कि उसकी आवाज़ सीधे अंकुर बिहार के व्हाट्सएप ग्रुप में जाकर गिरी—और दिन भर वहीं गूंजती रही।
पूर्व चेयरमैन द्वारा अंकुर बिहार कॉलोनी के चार लोगों पर गाजियाबाद विकास प्राधिकरण से कथित अवैध धनराशि लेने के आरोप लगाए गए। आरोप ऐसे कि सबूत कम, चर्चा ज़्यादा—और सवाल यह कि झंडा ऊपर था या राजनीतिक तीर?
आरोपों की जद में आए प्रशांत झा ने भी चुप्पी की जगह मोबाइल उठाया और कॉलोनीवासियों के नाम संदेश जारी कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि “हमने ज़मीन पर काम किया है, इसलिए कुछ लोगों को ज़मीन खिसकती दिख रही है।”
साथ ही यह तंज़ भी जड़ दिया कि विकास करने की बजाय कुछ नेता झूठ के सहारे राजनीति का मरहम लगाने में लगे हैं। चुनौती भी खुली—आरोप हैं तो सबूत भी दिखाइए।
इसी कड़ी में सुधाकर तिवारी ने तो मामला और आगे बढ़ा दिया। उन्होंने व्हाट्सएप पर लिखा कि अगर यह साबित हो जाए कि उन्हें कहीं से “महीना” मिलता है, तो वे लोनी छोड़ने को तैयार हैं।
मतलब साफ—या तो सच्चाई सामने आए, या फिर आरोपों की दुकान बंद हो।
करण सिंह ग्रोवर ने भी बिना घुमा-फिरा आरोपों को निराधार बता दिया और इशारों-इशारों में पूछ लिया—सबूत हैं या सिर्फ भाषण?
उधर, लोनी की चाय की दुकानों से लेकर गलियों तक एक ही चर्चा रही—
जब बिल्डर नियमों को रौंदते हुए धड़ल्ले से निर्माण कर रहे हैं, तो फिर गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की आंखों पर विकास का चश्मा आखिर क्यों चढ़ा हुआ है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि शिकायतें दी जाती हैं, फाइलें बनती हैं, लेकिन कार्यवाही कहीं खो जाती है। सवाल उठता है कि यह चुप्पी अवैध धन की भाषा है या फिर राजनीतिक दबाव की शालीनता?
कुल मिलाकर, झंडोत्तोलन में तिरंगा तो फहरा, लेकिन उसके नीचे राजनीति ने एक बार फिर बता दिया कि
लोनी में असली आज़ादी अभी भी सवालों के घेरे में है
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