सिंगरौली

उर्जाधानी में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से बढ़ रहा पर्यावरण संकट

 नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
 सिंगरौली। सिंगरौली जिले के माड़ा रेंज अंतर्गत फैले घने जंगल आज गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। प्राकृतिक धरोहर और जैव विविधता से परिपूर्ण इन जंगलों की हरियाली पर अब मानव लालच की काली छाया पड़ चुकी है। जिम्मेदार अधिकारियों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही के चलते इन जंगलों में अनाधुन पेड़ कटाई और अवैध कब्जे का सिलसिला तेजी से बढ़ता जा रहा है।
स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की मानें तो माड़ा रेंज के भीतर बिना किसी अनुमति के बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की जा रही है। लकड़ी माफिया बेखौफ होकर पेड़ काट रहे हैं, और जिम्मेदार वन विभाग के अधिकारी या तो आंखें मूंदे बैठे हैं या मिलीभगत के आरोपों से घिरे हुए हैं। हजारों की संख्या में बहुमूल्य पेड़ की काटे जा चुके हैं, जिससे न सिर्फ वन क्षेत्र सिकुड़ रहा है बल्कि इकोसिस्टम भी गड़बड़ हो रहा है।
भू-माफियाओं की नज़र में जंगल
पेड़ों की कटाई के साथ-साथ जंगल की जमीन पर अवैध कब्जे भी तेजी से बढ़े हैं। कई जगहों पर स्थायी निर्माण कर लिए गए हैं तो कहीं खेती की जा रही है। कुछ लोगों द्वारा तो जंगल में पक्के मकान और दुकानों तक का निर्माण कर लिया गया है। यह सब खुलेआम हो रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है।
वन्य जीवों का संकट घरों में घुस रहे जंगली जानवर
जंगलों के कटने और मानव बस्तियों की ओर फैलते अवैध कब्जों ने वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास से बेदखल कर दिया है। फलस्वरूप अब जानवरों को भोजन और आश्रय की तलाश में गांवों और कस्बों की ओर रुख करना पड़ रहा है। आए दिन तेंदुआ, भालू, जंगली सूअर मानव बस्तियों में घुसने की खबरें आ रही हैं। कई बार यह टकराव हिंसक रूप ले चुका है, जिसमें जानवरों और इंसानों दोनों की जानें गई हैं।
स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन कई बार इस विषय को लेकर जिला प्रशासन और वन विभाग को अवगत करा चुके हैं, लेकिन परिणामस्वरूप ना तो ठोस कदम उठाए गए और ना ही अवैध कब्जा हटाने की कोई स्थायी कार्यवाही हुई। आरोप यह भी हैं कि कुछ वन अधिकारी माफियाओं से मिलीभगत कर खुद इन गतिविधियों की निगरानी में शामिल हैं।
क्या कहते है रहवासी?
ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही हालात रहे तो आने वाले वर्षों में माड़ा रेंज का अस्तित्व पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। “हमने बचपन में जो घना जंगल देखा था, अब वहां खाली मैदान और कटी हुई लकड़ियां ही दिखती हैं, एक बुजुर्ग ग्रामीण ने आंखों में आंसू लिए बताया।
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