टिकट को लेकर दावेदारों में बढ़ी सक्रियता, मौजूदा विधायक के सामने जनता की नाराजगी और संगठन में अंदरूनी खींचतान बड़ी चुनौती
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : विधानसभा चुनाव में अभी समय जरूर है, लेकिन लोनी विधानसभा क्षेत्र में सियासी तापमान अभी से बढ़ने लगा है। राजनीतिक दलों में संभावित प्रत्याशियों को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है और समर्थक अपने-अपने पसंदीदा नेताओं को टिकट मिलने के दावे करने लगे हैं। सबसे अधिक चर्चा सत्तारूढ़ भाजपा को लेकर है, जहां टिकट के संभावित दावेदारों के बीच अंदरूनी प्रतिस्पर्धा आने वाले चुनाव में पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल मौजूदा विधायक को दोबारा मैदान में उतारने को लेकर माना जा रहा है। क्षेत्र में विधायक के प्रति नाराजगी की चर्चाएं लगातार सामने आ रही हैं। यदि पार्टी मौजूदा विधायक पर ही भरोसा जताती है तो उन्हें केवल विपक्ष से ही नहीं, बल्कि टिकट की दौड़ में शामिल अपने ही पार्टी के अन्य दावेदारों और उनके समर्थकों से भी मुकाबला करना पड़ सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टिकट से वंचित रहने वाले दावेदार यदि पूरी ताकत से संगठन के अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में नहीं जुटे तो इसका सीधा असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।
भाजपा संगठन में भी दिखाई दे रही खामोशी
भाजपा के संगठनात्मक समीकरणों को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं हैं। लोनी विधानसभा क्षेत्र में संगठन को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभाने वाली भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष आरती मिश्रा की हाल के दिनों में पार्टी के कार्यक्रमों, बैनर और पोस्टरों से उनका नाम गायब होना व पार्टी कार्यक्रमो में कम मौजूदगी को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच सवाल उठ रहे हैं। हालांकि इसके राजनीतिक कारणों को लेकर कोई आधिकारिक स्थिति सामने नहीं आई है, लेकिन पार्टी के अंदर इसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।
दूसरी ओर, भाजपा के कई पुराने कार्यकर्ता पार्टी और संगठन के कार्यक्रमों में पहले की तुलना में कम सक्रिय नजर आने की चर्चा है। वहीं नए कार्यकर्ताओं और समर्थकों का एक वर्ग सोशल मीडिया के माध्यम से विधायक के विकास कार्यों का प्रचार करने में जुटा हुआ है। व्हाट्सऐप ग्रुपों और सोशल मीडिया पर विकास कार्यों को लेकर दावे और प्रतिदावे लगातार सामने आ रहे हैं।
विकास कार्यों की धीमी रफ्तार बनी चुनावी मुद्दा
लोनी की राजनीति में विकास कार्य इस बार महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकते हैं। लोनी बॉर्डर से पुस्ता चौकी, बंथला से लोनी तथा पाभी सादकपुर क्षेत्र के मुख्य मार्गों पर निर्माण एवं यातायात संबंधी समस्याओं के कारण लोगों को लंबे समय से परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जाम के चलते नौकरीपेशा लोगों, व्यापारियों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों को रोजाना अपने गंतव्य तक पहुंचने में अतिरिक्त समय लग रहा है।
स्थानीय लोगों का एक वर्ग इन निर्माण कार्यों में देरी के लिए जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदार मानता है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते संबंधित विभागों और जनप्रतिनिधियों ने गंभीरता दिखाई होती तो समस्याओं का समाधान तेजी से हो सकता था। विधायक की ओर से निर्माण कार्य जल्द पूरा होने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन धरातल पर काम की गति को लेकर लोगों में असंतोष दिखाई देता है।
चुनाव में विकास के साथ नाराजगी भी बनेगी मुद्दा
राजनीतिक जानकारों की मानें तो आगामी चुनाव में केवल सड़क, नाली, पानी और जाम , बिजली,जैसे स्थानीय मुद्दे ही निर्णायक नहीं होंगे, बल्कि जनता और जनप्रतिनिधि के बीच संवाद भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। लंबे समय से समस्याओं से जूझ रहे मतदाता अब यह देखना चाहते हैं कि उनकी शिकायतों को कौन गंभीरता से सुनता है और समाधान के लिए कितनी सक्रियता दिखाता है।
भाजपा के लिए चुनौती दोहरी है। एक ओर उसे अपने संभावित प्रत्याशी के पक्ष में संगठन की एकजुटता बनाए रखनी होगी, वहीं दूसरी ओर जनता के बीच पैदा हुई नाराजगी को दूर करने के लिए जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ानी होगी। यदि पार्टी के अंदर टिकट को लेकर असंतोष रहा और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर नहीं हुई तो इसका नुकसान चुनाव में पार्टी को उठाना पड़ सकता है।
भीतरघात ने बिगाड़ा समीकरण तो चौंका सकते हैं नतीजे
लोनी की चुनावी राजनीति में प्रत्याशी की व्यक्तिगत लोकप्रियता के साथ संगठन की भूमिका भी अहम रहने वाली है। भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष से ज्यादा संभावित भीतरघात और कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता को माना जा रहा है। टिकट के बाद यदि असंतुष्ट दावेदारों और उनके समर्थकों को साथ नहीं जोड़ा गया तो चुनावी गणित प्रभावित हो सकता है।
वहीं जनता की नाराजगी को समय रहते दूर नहीं किया गया तो विकास कार्यों की देरी और स्थानीय समस्याएं चुनावी मुद्दे का रूप ले सकती हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में भाजपा नेतृत्व के सामने लोनी में संगठन को एकजुट करने, पुराने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, संभावित दावेदारों के बीच समन्वय बनाने और जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की बड़ी चुनौती होगी।
फिलहाल लोनी की सियासत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि टिकट किसे मिलेगा और टिकट मिलने के बाद पार्टी के कितने नेता और कार्यकर्ता पूरी ताकत से उसके साथ खड़े होंगे। यदि संगठन की नाराजगी और जनता की समस्याओं को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाला विधानसभा चुनाव लोनी में कई राजनीतिक समीकरणों को उलट सकता है और नतीजे उम्मीद से कहीं अधिक चौंकाने वाले हो सकते हैं।



