
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
मथुरा। मां की ममता का कोई मोल नहीं होता। यह न खून का रिश्ता देखती है और न जन्म का बंधन। वात्सल्य ग्राम में ऐसी ही ममता की अनूठी तस्वीर देखने को मिलती है। यहां मां यशोदा बनकर बच्चों को पाल रहीं महिलाएं भले ही उनकी जन्मदात्री नहीं हैं, लेकिन उनके लिए हर सुख-दुख में ढाल बनकर खड़ी हैं। बच्चों की मुस्कान में अपनी खुशी तलाशने वाली ये मां यशोदा अब अहोई अष्टमी पर उनकी लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला व्रत रखा। रविवार को दिनभर अन्न-जल त्यागकर ये माताएं अपनी संतानों की सलामती की कामना की। अष्टमी पर बच्चों की दीर्घायु और खुशहाली के लिए करेंगी उपवास वृंदावन स्थित वात्सल्य ग्राम में ऐसे बच्चों को परिवार का स्नेह मिलता है, जिन्हें जीवन की शुरुआत में अपनों का साथ नहीं मिला। संस्थापक साध्वी ऋतंभरा ने यहां गोकुलम परिवार व्यवस्था के माध्यम से उन्हें मां, मौसी और नानी का रिश्ता दिया है। हर परिवार में मां यशोदा बच्चों के पालन-पोषण से लेकर उनकी शिक्षा और संस्कारों तक की जिम्मेदारी निभाती हैं। समय के साथ इन रिश्तों में इतना अपनापन घुल गया है कि बच्चों की चिंता और उनकी खुशियां ही इन माताओं की दुनिया बन गई हैं। वात्सल्य परिवार की मुखिया सुमनलता परमानंद बताती हैं कि वह 20 वर्ष से यहां रह रही हैं। उनके परिवार में सात बच्चे हैं, जिनमें चार बेटे और तीन बेटियां हैं। बड़ा बेटा शाश्वत 26 वर्ष का है और नौकरी कर रहा है। वह हर वर्ष बच्चों की दीर्घायु के लिए अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत रखती हैं। साधिका परमानंद वर्ष 2004 में वात्सल्य ग्राम आई थीं। उनके परिवार में छह बेटियां और एक बेटा है। वह कहती हैं कि बच्चों के साथ रहते हुए कभी घर से दूर होने का अहसास नहीं हुआ। सभी बड़े होकर एक-दूसरे का सहारा बन रहे हैं। साथी परमानंद वर्ष 2005 से यहां हैं। उनके परिवार में दस बच्चे हैं। वह भी बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए व्रत रखा हैं।



