मेरठ

सीसीएसयू के विधि प्राध्यापक डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने विश्व विधि सम्मेलन में ‘धर्म’ आधारित एआई न्याय मॉडल प्रस्तुत किया

27 देशों के 120 से अधिक विधि विशेषज्ञों के समक्ष रखा मानव-केंद्रित न्यायिक एआई का दृष्टिकोण

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।

मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू), मेरठ के विधि अध्ययन संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय ‘वर्ल्ड कांग्रेस: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐज़ ए फैक्टर इन द ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ लॉ’ में न्यायिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के नैतिक एवं मानवीय उपयोग पर अपना शोध प्रस्तुत किया। यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 17 एवं 24 जुलाई, 2026 को वर्चुअल माध्यम से आयोजित हुआ, जिसका प्रसारण मिनास गेरैस, ब्राजील से किया गया।

सम्मेलन में 27 देशों के 120 से अधिक विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों एवं शोधकर्ताओं ने भाग लिया। इस अवसर पर डॉ. त्यागी ने “धर्म, न्याय और कृत्रिम बुद्धिमत्ता: स्वचालित न्यायिक प्रणालियों के लिए हिंदू विधि-दर्शन की पुनर्कल्पना” विषय पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत करते हुए न्यायिक एआई के लिए भारतीय दार्शनिक अवधारणा ‘धर्म’ पर आधारित नैतिक ढांचे का प्रस्ताव रखा।

अपने व्याख्यान में डॉ. त्यागी ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2026 में जारी न्यायिक एआई के मसौदा दिशा-निर्देशों का विश्लेषण करते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने केस मैनेजमेंट, कानूनी शोध, प्रतिलेखन एवं अनुवाद जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय दक्षता प्रदान की है, लेकिन यह नैतिक विवेक एवं मानवीय निर्णय क्षमता का विकल्प नहीं बन सकती। उन्होंने कहा कि एआई सांख्यिकीय विश्लेषण एवं पूर्वानुमान पर आधारित होती है, जबकि न्याय का आधार नैतिक संवेदनशीलता और मानवीय विवेक है।

डॉ. त्यागी ने कहा कि ‘धर्म’ को केवल धार्मिक अवधारणा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह न्याय, कर्तव्य, निष्पक्षता एवं नैतिक संतुलन पर आधारित एक समृद्ध विधिक दर्शन है। किसी भी विधिक व्यवस्था की वैधता केवल उसकी तकनीकी दक्षता से नहीं, बल्कि उसके नैतिक दायित्वों और संवैधानिक मूल्यों के पालन से निर्धारित होती है।

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के प्रस्तावित एआई ढांचे का स्वागत करते हुए कहा कि इसमें मानव की सर्वोच्च भूमिका को स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया है। उन्होंने कहा कि मसौदा दिशा-निर्देशों में एआई आधारित सजा निर्धारण, स्वचालित न्यायिक निर्णय तथा एल्गोरिदमिक जोखिम मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाओं पर रोक का प्रावधान न्यायपालिका में मानवीय जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

भविष्य में न्यायिक तकनीक के जिम्मेदार उपयोग के लिए डॉ. त्यागी ने पांच प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित एक नैतिक मॉडल प्रस्तुत किया। इसमें मानव सर्वोच्चता, पारदर्शिता, निष्पक्षता, जवाबदेही तथा नैतिक संयम को एआई शासन का आधार बनाने की वकालत की गई। उन्होंने कहा कि जिन मामलों में नैतिक निर्णय, विश्वसनीयता का आकलन और न्यायिक विवेक आवश्यक हो, वहां एआई केवल सहायक भूमिका में ही सीमित रहनी चाहिए।

अपने संबोधन में डॉ. त्यागी ने कहा, “किसी भी विधिक व्यवस्था का आधुनिकीकरण अपनी दार्शनिक एवं सांस्कृतिक विरासत को त्यागे बिना भी संभव है। ‘धर्म’ कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उत्तरदायी एवं न्यायोन्मुखी उपयोग के लिए एक सशक्त नैतिक आधार प्रदान करता है, जो समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करता है।”

उन्होंने वैश्विक नीति-निर्माताओं एवं विधि विशेषज्ञों से आह्वान किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को न्याय का विकल्प नहीं, बल्कि न्याय को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाने वाले सहयोगी उपकरण के रूप में विकसित किया जाए।

व्याख्यान के दौरान प्रो. जॉर्ज आइजैक टोरेस मैनरिक (पेरू), प्रो. मार्सियो एडुआर्डो सेनरा नोगुएरा पेड्रोसा मोराइस, प्रो. डेल्टन रिबेरो (ब्राजील), प्रो. मॉरिसियो दा कुन्हा साविनो फिलो (ब्राजील), प्रो. क्लाइडे कालगारो (ब्राजील), प्रो. लारिसा सान्निकोवा (रूस), प्रो. रोबर्टो गैरेट्टो (इटली), प्रो. रूबेन मिरांडा गोंकाल्वेस (स्पेन), प्रो. टार्सिस बैरेटो ओलिवेरा (ब्राजील) तथा प्रो. एडुआर्डो जे.आर. लुगदार (अर्जेंटीना) सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय विधि विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

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