भुगतान में देरी से झारखंड के संवेदकों पर बढ़ा आर्थिक संकट, विकास कार्य भी प्रभावित
Financial crisis deepens for Jharkhand contractors due to payment delays; development works also affected.

नेशनल प्रेस टाइम्स ब्यूरो।
पाकुड़। मिट्टी, मोरम और बालू के चालान उपलब्ध नहीं होने तथा भुगतान प्रक्रिया प्रभावित होने से झारखंड के हजारों संवेदकों के समक्ष गंभीर आर्थिक संकट उत्पन्न होने की बात सामने आ रही है। संवेदकों का कहना है कि लंबे समय से भुगतान लंबित रहने के कारण न केवल उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो रही है, बल्कि विभिन्न विकास योजनाओं पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ रहा है। निर्माण कार्यों से जुड़े मिस्त्री, मजदूर और अन्य श्रमिकों की रोजी-रोटी भी प्रभावित होने लगी है। पाकुड़ जिले के कई संवेदकों के अनुसार उन्होंने अपनी जमा पूंजी लगाकर सरकारी विकास योजनाओं का कार्य पूरा किया, लेकिन करीब छह महीने से भुगतान नहीं होने के कारण अब उनके सामने आर्थिक संकट गहरा गया है। भुगतान की उम्मीद में संवेदक प्रतिदिन संबंधित कार्यालयों का चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें निराश होकर वापस लौटना पड़ रहा है। संवेदकों का कहना है कि ग्रामीण कार्य विभाग, आरसीडी, विशेष प्रमंडल समेत संबंधित विभागों के कार्यालयों में भुगतान के संबंध में लगातार जानकारी लेने के बावजूद स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है। कई संवेदकों पर मजदूरों, मिस्त्रियों और निर्माण सामग्री आपूर्तिकर्ताओं का बकाया बढ़ता जा रहा है। संवेदकों ने सरकार से मांग की है कि आगामी दुर्गा पूजा से पहले लंबित भुगतान की प्रक्रिया पूरी की जाए। उनका कहना है कि यदि समय पर भुगतान नहीं हुआ तो त्योहार के दौरान उनके सामने आर्थिक स्थिति और गंभीर हो सकती है। लंबे समय से भुगतान नहीं मिलने के कारण कई संवेदकों के पास दैनिक जरूरतों और कार्यालय आने-जाने तक के खर्च के लिए पर्याप्त राशि नहीं बची है। संवेदकों के मुताबिक, निर्माण कार्यों का भुगतान रुकने का असर केवल ठेकेदारों तक सीमित नहीं है। निर्माण कार्यों में सीमेंट, छड़, बालू, मोरम, परिवहन और अन्य सामग्री उपलब्ध कराने वाले व्यवसायियों के साथ-साथ स्थानीय दुकानदारों और मजदूरों की आय भी इससे जुड़ी है। भुगतान बाधित होने से स्थानीय बाजार में भी कारोबार प्रभावित होने की शिकायत सामने आ रही है। कुछ संवेदकों ने बताया कि लगातार आर्थिक तंगी के कारण उनके स्थानीय होटल और अन्य दुकानों में भी बकाया बढ़ गया है। उनका कहना है कि कई लोगों पर हजारों रुपये तक का भोजन का बिल लंबित हो चुका है। ऐसी स्थिति में रोजाना कार्यालयों के चक्कर लगाने के दौरान भोजन की व्यवस्था करना भी मुश्किल हो रहा है। संवेदकों का यह भी कहना है कि वे अपनी समस्याओं को खुलकर अधिकारियों के समक्ष रखने में संकोच करते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि शिकायत या विरोध करने से लंबित भुगतान की प्रक्रिया और प्रभावित हो सकती है। हालांकि, यह संवेदकों की ओर से व्यक्त की गई आशंका है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। संवेदकों ने झारखंड सरकार से मांग की है कि यदि मौजूदा प्रक्रिया में तकनीकी या प्रशासनिक बाधाएं हैं तो सरकार भुगतान के लिए वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करे, ताकि पहले से पूरे किए जा चुके विकास कार्यों का भुगतान किया जा सके। संवेदकों का कहना है कि सरकार के निर्णयों का उद्देश्य विकास कार्यों को सुचारु रूप से संचालित करना होना चाहिए। इसलिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है जिससे एक ओर नियमों का पालन हो और दूसरी ओर पूर्ण हो चुके कार्यों के भुगतान में अनावश्यक विलंब न हो। संवेदकों ने झारखंड सरकार से मामले में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए भुगतान संबंधी बाधाओं को दूर करने, लंबित भुगतान की प्रक्रिया तेज करने और निर्माण कार्यों से जुड़े हजारों श्रमिकों एवं व्यवसायियों की आजीविका को ध्यान में रखते हुए आवश्यक कदम उठाने की मांग की है।



