पेसा कानून को लागू करने में 25 वर्षों से अधिक की देरी ने खड़े किये कई सवाल- विजय शंकर नायक
The delay of more than 25 years in implementing the PESA Act has raised many questions - Vijay Shankar Nayak

नेशनल प्रेस टाइम्स ब्यूरो।
रांची। केन्द्रीय उपाध्यक्ष, आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच व पूर्व विधायक प्रत्याशी विजय शंकर नायक ने कहा कि आदिवासी बाहुल्य झारखण्ड राज्य में पेसा कानून को लागू करने में 25 वर्षों से अधिक की देरी ने कई सवाल खड़े किये हैं जो संविधान के 73वें संशोधन की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) भारत के आदिवासी समुदायों को स्वशासन, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) के नेतृत्व में बनाया गया था। जो एक क्रांतिकारी कानून है। यह कानून 73वें संवैधानिक संशोधन (1992) का हिस्सा था, जिसने पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत किया। पेसा कानून 24 दिसंबर 1996 को संसद द्वारा पारित किया गया और इसे पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में लागू किया गया। इसका उद्देश्य आदिवासी समुदायों को स्वशासन और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्रदान करना था। पेसा को विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए बनाया गया था। यह कानून पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को सशक्त करता है। झारखण्ड, जो आदिवासी बाहुल्य राज्य है, में पेसा कानून को लागू करने में 25 वर्षों से अधिक की देरी ने कई सवाल खड़े किए हैं। झारखण्ड में पेसा कानून लागू न होने के पीछे कई कारण हैं। उन्होंने उल्लेखनीय बातें साझा करते हुए कहा कि (प्रशासनिक सुस्ती-)1996 में पेसा लागू होने के बाद, झारखण्ड राज्य का 2000 में गठन के बाद भी नियमावली तैयार नहीं की। 2022 में पहली ड्राफ्ट नियमावली जारी हुई, लेकिन आपत्तियों के कारण इसे लागू नहीं किया गया। 2023 में दूसरा ड्राफ्ट आया, और 29 जुलाई 2024 को झारखण्ड हाई कोर्ट ने सरकार को दो महीने में नियमावली अधिसूचित करने का आदेश दिया, जो अब तक पूरा नहीं हुआ। उदाहरणार्थ पंचायती राज विभाग की निदेशक निशा उरांव ने स्वीकार किया कि सुझावों पर विचार चल रहा है, लेकिन प्रक्रिया धीमी है। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी- विभिन्न दलों की सरकारों (भाजपा: 2000-2019, झामुमो-कांग्रेस-आरजेडी: 2019-वर्तमान) ने पेसा को प्राथमिकता नहीं दी। हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह संविधान के 73वें संशोधन की भावना के खिलाफ है। वही खनन माफिया और औद्योगिक समूह पेसा के प्रावधानों से प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि यह ग्राम सभाओं को संसाधनों पर नियंत्रण देता है। उदाहरण: झारखण्ड में खनन क्षेत्रों में बिना ग्राम सभा की सहमति के खनन कार्य अवैध रूप से व्यापक रूप से हुए, जो पेसा लागू होने पर रुक सकते थे। कई आदिवासी समुदायों को पेसा के प्रावधानों की जानकारी नहीं है। गुमला जिले में 2023 में एक सर्वे में 70% आदिवासियों ने कहा कि उन्हें पेसा के बारे में नहीं पता। वही पेसा लागू करने में निम्नलिखित बाधाएं हैं- विधि विभाग और पंचायती राज विभाग के बीच समन्वय की कमी ने नियमावली को अंतिम रूप देने में देरी की। उदाहरण: 2022 के ड्राफ्ट पर 500 से अधिक आपत्तियां प्राप्त हुईं, जिनका समाधान नहीं हुआ। झारखण्ड में कोयला, लौह अयस्क, और अन्य खनिजों का बड़े पैमाने पर खनन होता है। पेसा लागू होने से ग्राम सभाओं की सहमति जरूरी होगी, जो खनन कंपनियों के लिए बाधा बन सकता है। उदाहरण: राज्य के सभी जिलों में,पत्थर,आयरन ओर, मैंगनीज, कोयला खनन एवं अन्य खनिजों के लिए ग्राम सभाओं की अनदेखी की गई। भाजपा और झामुमो-कांग्रेस गठबंधन एक-दूसरे पर पेसा लागू न करने का आरोप लगाते हैं। भाजपा जो 15 वर्षो तक झारखण्ड मे सत्तासीन रहीं मग़र उसने कभी भी पेसा कानून को लागू करने की दिशा मे कोई ठोस पहल नहीं किया।
वही पेसा लागू होने से आदिवासियों का सशक्तिकरण होगा:
ग्राम सभाएं जल, जंगल, जमीन, और लघु खनिजों (जैसे बालू, पत्थर) पर नियंत्रण प्राप्त करेंगी। उदाहरण: मध्य प्रदेश में पेसा लागू होने के बाद कुछ ग्राम सभाओं ने लघु वन उपज से आय अर्जित की। ग्राम सभाएं विकास योजनाओं, सामाजिक विवादों, और छोटे अपराधों का निपटारा कर सकेंगी। उदाहरण: छत्तीसगढ़ के बस्तर में ग्राम सभाओं ने स्थानीय विवादों को सुलझाने में सफलता पाई। ग्राम सभाओं को बाजार प्रबंधन और छोटे जल निकायों से आय होगी। उदाहरण: महाराष्ट्र में कुछ ग्राम सभाओं ने मछली पालन से आय बढ़ाई। आदिवासी परंपराओं और प्रथागत कानूनों को मान्यता मिलेगी।
उदाहरण:
राजस्थान में पेसा के तहत आदिवासी रीति-रिवाजों को संरक्षित किया गया। पेसा कानून को लागू नहीं कराने मे मुख्य भूमिका। खनन माफिया और औद्योगिक घरानों, प्रशासनिक अधिकारियों, नेताओ की रहीं है क्योंकि पेसा उनके निजी हितों को नुकसान करेगा क्योंकिपेसा से खनन कंपनियों को ग्राम सभा की सहमति लेनी होगी। उदाहरण: छत्तीसगढ़ में कुछ खनन परियोजनाएं रुकीं, क्योंकि ग्राम सभाओं ने सहमति नहीं दी। ग्राम सभाओं को अधिक शक्तियां देने से स्थानीय प्रशासन के साथ टकराव हो सकता है।
उदाहरण: मध्य प्रदेश में पंचायत और गृह विभाग के बीच नियमों को लेकर विवाद रहा है। जबकि पेसा कानून 24 दिसंबर 1996 को लागू हुआ और 10 राज्यों (आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना) पर लागू है। आज झारखंड में पेसा लागू करने के लिए विभिन्न आदिवासी संगठनो के द्वारा लगातार आंदोलन के माध्यम से दबाव बना रहीं हैं मग़र सरकार पेसा को लागू करने के कोई ठोस पहल अभी तक नहीं की है। लगातार आदिवासी संगठनों का आंदोलन चल रहा है l इस कानून को लागू कराने हेतु *हाई कोर्ट की निगरानी भी चल रहीं है। समय की मांग है कि सर्वदलीय सहमति बना कर सभी दलों (झामुमो, कांग्रेस, आरजेडी, भाजपा) को एक मंच पर लाकर नियमावली को अंतिम रूप देना चाहिए और केंद्र को भी इस दिशा मे हस्तक्षेप कर राज्य की सरकार को दबाव डालने की विशेष आवश्यकता है नहीं तो स्पष्ट और कड़ी चेतावनी दे की जबतक पेसा कानून लागू नहीं किए जाते तबतक केंद्र सरकार से आर्थिक प्रोत्साहन और तकनीकी सहायता और झारखंड को अनुदान नहीं दिया जाएगा । राजनीतिक दलों की भूमिका निष्कर्ष पेसा कानून झारखंड के आदिवासियों को सशक्त बनाने और उनकी सांस्कृतिक-आर्थिक विरासत की रक्षा का एक शक्तिशाली हथियार है। प्रशासनिक सुस्ती, खनन लॉबी, और राजनीतिक मतभेदों ने इसे लागू करने में बाधा डाली। अन्य राज्यों (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़) के उदाहरण दिखाते हैं कि पेसा से ग्राम सभाएं सशक्त हो सकती हैं, लेकिन कमजोर नियमावली इसके प्रभाव को सीमित कर सकती है। झारखंड में पेसा लागू करने के लिए सामाजिक आंदोलन, कानूनी निगरानी, और सर्वदलीय सहमति जरूरी है। आदिवासी समुदायों को जागरूक कर और दबाव बनाकर इस कानून को लागू करवाया जा सकता है, ताकि झारखंड के सदियों से शोषित, पीड़ित, अधिकार से वंचित अंतिम पायदान में बैठे आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकार मिल सके।



