गाजियाबाद

लोनी कोतवाली पुलिस पर नए सवाल 

हिरासत में लगी चोटें, इलाज कराने की बजाए सीधे जेल भेजा गया

जीटीबी अस्पताल के लिए रेफर होने के बावजूद इलाज न कराने पर विवाद गहराया
नेशनल प्रेस टाइम्स , ब्यूरो
लोनी। ऑटो रिक्शा चालक वकील के पुत्र मुस्ताक के मामले में एक नया पहलू सामने आया है। आरोप है कि पुलिस ने उसे जे.पी. गर्ल्स स्कूल के पास से इसलिए पकड़कर उसका ऑटो जब्त कर लिया क्योंकि उसने कथित रूप से पुलिस को “एंट्री” नहीं दी। विरोध जताने पर उस पर पुलिस से बदसलूकी का मामला दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया।
पीड़ित परिवार का कहना है कि हिरासत के दौरान मुस्ताक के साथ मारपीट की गई, जबकि पुलिस इन आरोपों से साफ इंकार कर रही है। जांच में यह तथ्य सामने आया कि 23/12/25 को तिराहा चौकी प्रभारी ने उसे मेडिकल परीक्षण के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, लोनी गाजियाबाद भेजा था।
मेडिकल रिपोर्ट में सूजन व गंभीर चोटों का जिक्र — डॉक्टर ने जीटीबी अस्पताल रेफर किया
रिपोर्ट के मुताबिक वकील पुत्र मुस्ताक के शरीर पर सूजन और कई गंभीर चोटों के निशान पाए गए। गंभीर हालात को देखते हुए डॉक्टर ने उसे दिल्ली के गुरु तेग बहादुर (जीटीबी) अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। परिवार का आरोप है कि इसके गंभीर चोटे होने के बाद भी पुलिस न तो वकील को उपचार के लिए लेकर गई और न ही आगे की जांच कराई — बल्कि बिना इलाज कराए ही सीधे जेल भेज दिया गया। अब सवाल उठ रहा है —आखिर क्यों?
सबसे अहम प्रश्न — चोटें आईं कैसे और जिम्मेदार कौन?
अब कई अहम सवाल खड़े हो रहे हैं—
जब मुस्ताक पुलिस हिरासत में था, तो उसके शरीर पर चोटें और सूजन कैसे पहुंचीं?
डॉक्टर के रेफर करने के बाद भी इलाज कराने में लापरवाही क्यों की गई?
क्या इस चूक के लिए किसी पर कार्यवाही होगी?
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि मारपीट नहीं हुई, तो मेडिकल रिपोर्ट में चोटों का जिक्र आखिर कैसे दर्ज हुआ — और पुलिस मामले से दूरी क्यों बना रही है?
क्या ऑटो सीज़ और कथित पिटाई के पीछे कोई और वजह?
यह भी चर्चा में है कि—
क्या यह केवल नियम उल्लंघन का मामला है?
या फिर किसी दबाव, लेन-देन या वसूली विवाद से जुड़ी कड़ी छिपाई जा रही है?
परिजनों का कहना है कि वे इस पूरे मामले को उच्च अधिकारियों और मानवाधिकार संगठनों तक ले जाएंगे ताकि सच्चाई बाहर आ सके।
निष्पक्ष कार्रवाई होगी या मामला दबा दिया जाएगा?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अब नजर इस बात पर है—
क्या पारदर्शी जांच के बाद दोषी पुलिसकर्मियों पर सख्त विभागीय व कानूनी कार्यवाही क होगी,
या फिर मामले को पुलिस टीम के बचाव की कोशिशों में दबा दिया जाएगा?
फिलहाल, यह घटनाक्रम एक बार फिर पुलिस व्यवस्था, जवाबदेही और अधिकारों की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
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