गाजियाबाद

“नाला जीत गया… इंसान हार गया” — वार्ड 33 में संवेदनहीन व्यवस्था ने ले ली एक जान, 

जिम्मेदारों ने फोन तक उठाना ज़रूरी नहीं समझा

दिव्यांग परिवार के घर में घुसा नाले का गंदा पानी, शिकायतें बेअसर — भाजपा जिलाध्यक्ष के फोन भी हवा हो गए
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : नगरपालिका लोनी के अधिकारी-सभासद-सफाई निरीक्षक सब ‘व्यस्त’ निकले
लोनी गाजियाबाद  लोनी नगरपालिका वार्ड संख्या 33 डीएलएफ अंकुर विहार A-ब्लॉक में आखिरकार वही हुआ, जिसकी उम्मीद इस “संवेदनशील” व्यवस्था से की ही जा सकती थी—नाला जीत गया और आदमी हार गया। कई दिनों से घर में भरा नाले का गंदा पानी जब रसोई तक पहुँच गया, तब भी प्रशासन की नींद में जरा-सी भी करवट नही बथली। शिकायतें दर्ज हुईं, गुहार लगाई गई—पर व्यवस्था शायद किसी गहरी निद्रा-योग साधना में थी।
दुर्भाग्य इतना बड़ा कि 25 तारीख की रात उसी घर में मौत दस्तक दे गई—और अगले दिन अंतिम यात्रा तक को उसी बदबूदार नाले के पानी से होकर गुजरना पड़ा। लगता है “विकास का नया मॉडल” यही है—पहले नाला का गंदा पानी घर में घुसे, फिर इंसानियत बाहर निकल जाए।
इस बीच भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष आरती मिश्रा ने भी नगरपालिका अधिकारियों और सफाई व्यवस्था से जुड़े मेट को फोन कर हालात समझाने की कोशिश की—पर अफ़सोस, फोन तो बजा…लेकिन किसी ने जिम्मेदारी नहीं निभाई। सत्ता पक्ष की जिलाध्यक्ष के फोन जब बेअसर हो गए, तो आम नागरिक की पुकार का वजन भला कौन उठाए?
वार्ड के माननीय सभासद साहब भी इस संवेदनशील चुप्पी के साथी बने रहे , न सफाई कर्मी पहुँचा, न पानी निकालने वाला ट्रैक्टर—हाँ, सोशल मीडिया पोस्ट के लिए मुस्कान अवश्य सुरक्षित रखी गई।
आखिरकार, किसी संवेदनशील नागरिक ने अपने स्तर पर पानी निकलवाया—पर इस व्यवस्था का सड़ा हुआ घमंड कौन निकालेगा? सवाल अब भी गले तक पानी में खड़े हैं—
क्या दिव्यांग परिवार का दर्द वोट-मूल्य के हिसाब से “अप्रासंगिक” हो गया?
क्या मृतक की गरिमा भी फाइलों और कॉल-लॉग्स में खो जाती है?
और क्या जनप्रतिनिधि केवल पोस्टर, होर्डिंग और मंचों के लिए ही “जनसेवक” बनते हैं?
जनता चुप है—पर अंधी नहीं।
नाले का पानी भले सूख जाए… पर इस व्यवस्था की बदबू शायद लंबे समय तक रह जाएगी।
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