नेशनल प्रेस टाइम्स,ब्यूरो
बागपत |
कल्पना कीजिए:
आप एक आम नागरिक हैं। गांव की राजनीति में सक्रिय हैं, पंचायत सदस्य हैं, समाजसेवा भी करते हैं।
हर दिन ईमानदारी से समाज के बीच उठते-बैठते हैं।
और अचानक एक दिन सरकारी नोटिस आता है –
“आपने 112 वर्ग मीटर जमीन पर अवैध कब्जा किया है, तत्काल बेदखल हो जाइए और 3,02,400 रुपये का जुर्माना भी दीजिए!”
साथ ही, 5,000 रुपये ‘निषादन शुल्क’ भी अलग से।
हैरानी नहीं, ये हकीकत है!
ये कोई टीवी शो का मज़ाक नहीं,
बल्कि ग्राम गोठरा निवासी और बीडीसी सदस्य गौरव गुर्जर की जमीनी सच्चाई है।
गौरव गुर्जर की जुबानी –
“मैंने उस जमीन को देखा तक नहीं, कब्जा करना तो बहुत दूर की बात है। फिर भी मेरे नाम जुर्माना और बेदखली का आदेश थमा दिया गया!”
जिन पर गांव की जनता ने विश्वास कर बीडीसी बनाया,
अब वो खुद अपने ही हक और जमीन को लेकर प्रशासन से न्याय मांग रहे हैं।
“बिना जांच, बिना सुनवाई, कैसे लिख दिया 3 लाख का जुर्माना?”
गौरव गुर्जर का कहना है कि न मौके की जांच हुई, न किसी ने बयान लिया, न कोई प्रशासनिक सुनवाई हुई।
सीधे आदेश, सीधे जुर्माना –
क्या यही है डिजिटल इंडिया का नया न्याय तंत्र?
गांववालों की प्रतिक्रिया – ‘तो असली कब्जेदारों को भारत रत्न मिलना चाहिए!’
ग्रामवासियों की प्रतिक्रिया प्रशासन से भी तीखी निकली –
एक ग्रामीण ने व्यंग्य करते हुए कहा –
“अब तो बिना कब्जा किए ही चालान कटने लगे हैं… तो जो असली काबिज़ हैं, उन्हें पद्मश्री या भारत रत्न मिलना चाहिए!”
प्रशासन की “भूल या मिलीभगत?”
राजस्व विभाग की यह कार्यशैली न सिर्फ संदेह पैदा करती है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करती है –
क्या राजस्व रिकॉर्ड इतने भ्रामक हो चुके हैं कि अब निर्दोष भी दोषी ठहराए जाने लगे हैं?
गौरव गुर्जर ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले को डीएम से लेकर मुख्यमंत्री तक लेकर जाएंगे,
और जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, वह चुप नहीं बैठेंगे।
अगर आज ये हुआ, तो कल किसी और के साथ भी हो सकता है…
अगर एक जनप्रतिनिधि को बिना जांच, बिना सुनवाई, बिना सबूत के इस तरह बेदखली और जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है,
तो सोचिए –
आम ग्रामीण का क्या होगा?
क्या प्रशासन अब “मानव भूल” नहीं बल्कि “मानव कीमत” वसूलने पर तुला है?
“बिना कब्जे की बेदखली” – बागपत में नया ट्रेंड?
यदि इस मामले में जल्द ही उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच न की गई, तो संभव है कि भविष्य में
“बिना कब्जे के भी चालान” और “बिना निर्माण के भी जुर्माना”
बागपत की प्रशासनिक पहचान बन जाए!



