बरेली

विज्ञापन के बोझ तले दबा लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, भूख से जूझ रहे ग्रामीण पत्रकार

नेशनल प्रेस टाइम्स ,ब्यूरो
बरेली। बड़े मीडिया हाउसों की चमक-दमक के पीछे ग्रामीण पत्रकारों की जिंदगी बदहाल होती जा रही है। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के मालिक ग्रामीण पत्रकारों को डिस्पोजल गिलास की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। खबर ली और फिर भूल गए।
स्थिति ये है कि बंधुआ मजदूर को भी दिनभर के काम के बाद रोटी मिल जाती है, लेकिन गांव-गांव से गरीबों की आवाज उठाने और माफियाओं के कारनामे उजागर करने वाले ग्रामीण पत्रकार दो वक्त की रोटी को मोहताज हैं। अखबार मालिक पारिश्रमिक देने के बजाय उनसे त्योहारों और राष्ट्रीय पर्वों पर विज्ञापन लाने का दबाव बनाते हैं। दिनभर भूखे-प्यासे दफ्तरों के चक्कर लगाने के बाद घर पर परिवार के ताने सुनने को मिलते हैं। इस आर्थिक प्रताड़ना से कई पत्रकार अवसाद में हैं।
सवाल उठता है कि क्या सरकार ग्रामीण पत्रकारों के हित में कोई ठोस कदम उठाएगी या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यूं ही कराहता रहेगा।
Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button