त्योहार आते ही क्यों जागता है प्रशासन? मिलावट
कथित वसूली और नमूने बदलने के आरोपों की हो निष्पक्ष जांच सालभर नियमित निगरानी पर सवाल, त्योहारों पर अचानक छापेमारी तेज; दूध, मावा और पनीर की शुद्धता के साथ खाद्य सुरक्षा विभाग की जवाबदेही भी जरूरी
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बागपत। भारत में त्योहार खुशियों, मिठास और आपसी प्रेम के प्रतीक हैं। इन अवसरों पर घरों में मिठाइयां आती हैं, रिश्तेदारों का स्वागत होता है और बाजारों में दूध, मावा, पनीर, घी तथा अन्य खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ जाती है। लेकिन इसी समय मिलावट की आशंका और खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल भी उठने लगते हैं। आखिर साल में एक-दो बार छापेमारी की खबरें दिखाकर क्या प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेता है? क्या जनता को पूरे साल शुद्ध खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना विभाग का दायित्व नहीं है? सालभर निगरानी क्यों नहीं? दूध, पनीर और मिठाइयों की बिक्री केवल त्योहारों पर नहीं होती। इनका सेवन हर दिन लाखों परिवार करते हैं। ऐसे में खाद्य सुरक्षा विभाग की सक्रियता भी पूरे साल दिखाई देनी चाहिए। त्योहार आते ही छापेमारी तेज होना उचित है, क्योंकि उस समय मांग बढ़ती है, लेकिन सामान्य दिनों में नियमित निरीक्षण कमजोर पड़ जाए तो मिलावट पर स्थायी रोक कैसे लगेगी? जनता जानना चाहती है कि वर्षभर कितने प्रतिष्ठानों का निरीक्षण हुआ, कितने नमूने लिए गए, कितने नमूने जांच में असफल पाए गए और दोषियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई। केवल छापेमारी की तस्वीरें और खबरें पर्याप्त नहीं हैं। कार्रवाई का वास्तविक परिणाम सामने आना चाहिए। कथित मासिक वसूली के आरोप गंभीर कुछ क्षेत्रों में कारोबारियों और निरीक्षकों के बीच कथित मासिक लेन-देन के आरोपों को लेकर भी सवाल उठते हैं। यदि कहीं अनुचित आर्थिक लाभ के बदले नियमों की अनदेखी होती है, तो यह भ्रष्टाचार के साथ जनता की सेहत से खिलवाड़ का मामला भी है। हालांकि, ऐसे आरोपों को बिना प्रमाण स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। इसलिए प्रशासन को चाहिए कि शिकायत मिलने पर निष्पक्ष जांच कराए। यदि कोई अधिकारी या व्यापारी दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो। जांच केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित न रहे, बल्कि पूरी आपूर्ति शृंखला और संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी देखी जाए। नमूने बदलने के आरोपों से उठते हैं सवाल खाद्य सुरक्षा विभाग जब किसी दुकान से दूध, मावा, पनीर या मिठाई का नमूना लेता है, तो उसका उद्देश्य प्रयोगशाला में जांच कराकर खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता और सुरक्षा का पता लगाना होता है। लेकिन यदि नमूने की पहचान या उसे प्रयोगशाला तक पहुंचाने की प्रक्रिया पर ही सवाल उठें, तो पूरी कार्रवाई की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। यह आरोप भी सामने आने की बात कही जाती है कि कुछ मामलों में कथित आर्थिक लेन-देन के बाद मौके पर लिए गए मिलावटी खाद्य पदार्थ के स्थान पर फ्रेश मॉल जैसे ब्रांडेड उत्पाद का नमूना जांच के लिए प्रस्तुत कर दिया जाता है। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। बिना प्रमाण किसी ब्रांड, व्यापारी या अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन यदि ऐसा किसी मामले में हुआ है तो इसकी गंभीर जांच होनी चाहिए। सवाल यह है कि मौके पर लिए गए नमूने की पहचान, सील और रिकॉर्ड की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है? नमूना किसके पास रहा, प्रयोगशाला तक कैसे पहुंचा और क्या उसकी सील सुरक्षित थी? इन सभी चरणों का रिकॉर्ड होना चाहिए, ताकि किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच संभव हो सके। छापेमारी नहीं, ठोस परिणाम जरूरी खाद्य सुरक्षा विभाग को नमूने लेने के साथ उनकी समयबद्ध जांच और कानूनी कार्रवाई भी सुनिश्चित करनी चाहिए। निरीक्षण, नमूना संग्रह, प्रयोगशाला की रिपोर्ट और कार्रवाई की स्थिति का पारदर्शी रिकॉर्ड तैयार हो। जहां संभव हो, डिजिटल ट्रैकिंग और समय-मुद्रित तस्वीरों जैसी व्यवस्थाएं अपनाई जाएं, ताकि नमूनों की पहचान को लेकर संदेह की गुंजाइश कम हो। साथ ही, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि नमूना लिया जाना अपने आप में किसी व्यापारी को दोषी सिद्ध नहीं करता। निर्णय जांच रिपोर्ट और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। ईमानदार कारोबारियों को अनावश्यक परेशानी से बचाना और दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई करना, दोनों प्रशासन की जिम्मेदारी हैं। जनता की सेहत सर्वोपरि खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के अंतर्गत असुरक्षित खाद्य पदार्थों और नियमों के उल्लंघन के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है। इसलिए विभाग को किसी त्योहार या विशेष अभियान का इंतजार किए बिना नियमित निगरानी करनी चाहिए। दूध संग्रह केंद्रों, डेयरी इकाइयों, थोक विक्रेताओं और मिठाई की दुकानों तक निरीक्षण की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए। प्रशासन को कथित अवैध वसूली और नमूने बदलने की शिकायतों की जांच करानी चाहिए तथा नियमित निरीक्षण और कार्रवाई के आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। इससे जनता का भरोसा बढ़ेगा और ईमानदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी अनावश्यक संदेह कम होगा। निष्कर्ष त्योहारों की मिठास मिलावट की आशंका में नहीं बदलनी चाहिए। जनता को साल में एक-दो बार दिखाई देने वाली छापेमारी नहीं, बल्कि पूरे साल प्रभावी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था चाहिए। यदि कथित मिलीभगत या नमूने बदलने के आरोप सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए—चाहे वे व्यापारी हों या अधिकारी। आखिर सवाल सीधा है: जब नमूने की शुद्धता और जांच की निष्पक्षता पर ही संदेह उठने लगे, तो जनता भरोसा किस पर करे? प्रशासन की असली सफलता छापेमारी की संख्या में नहीं, बल्कि मिलावट रोकने, दोषियों को जवाबदेह बनाने और लोगों की सेहत सुरक्षित रखने में है।


