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भारत ने बॉर्डर पर ताना रूसी रडार

निशाने पर जे-20 विमान?

नई दिल्ली। चीन अब अपने विमान वाहक पोतों के लिए जे 35 को तैयार कर रहा है। अब जरा कल्पना कीजिए हिंद महासागर के बीचों-बीच में एक ऐसा विमान उड़ान भर रहा है जो हमारे रडार पर दिखाई ही ना दे। साथ ही पाकिस्तान की नजरें भी चीन के इसी जे 35 पर टिकी है। यानी भारत के सामने टू फ्रंट स्ट्रेंथ वार का खतरा खड़ा हो चुका है। इस बढ़ते अंधेरे को चीरने के लिए भारत को चाहिए था एक ऐसा रडार जो सिर्फ देखे नहीं बल्कि दुश्मन के स्ट्रेंथ को बेअसर कर दे।
रूस का नेब्बू यूएम रडार यह सिर्फ लोहे और बिजली का ढांचा नहीं है बल्कि यह वो तीसरी आंख है जो बादलों के पीछे छिपे चीन के जे 20 और समंदर में घात लगाए जे 35 के अदृश्य कवच को राख कर सकती है। जब वायु शक्ति 2026 में इसकी झलक दिखी तो बीजिंग के वॉर रूम में सन्नाटा पसर गया। दरअसल चीन ने पिछले एक दशक में अपनी वायु सेना को पूरी तरह से बदल दिया है। उसका ख20 माइल्टी ड्रैगन अब केवल एक प्रोटोटाइप नहीं बल्कि एक हकीकत है जो लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक भारतीय सीमाओं के करीब मंडरा रहा है। चीन का दावा है कि यह विमान किसी भी रडार की पकड़ में नहीं आता है। लेकिन खतरा यहीं खत्म नहीं होता है। चीन अब अपने विमान वाहक पोतों के लिए जे 35 को तैयार कर रहा है। अब जरा कल्पना कीजिए हिंद महासागर के बीचों-बीच में एक ऐसा विमान उड़ान भर रहा है जो हमारे रडार पर दिखाई ही ना दे। साथ ही पाकिस्तान की नजरें भी चीन के इसी ख35 पर टिकी है। यानी भारत के सामने टू फ्रंट स्ट्रेंथ वार का खतरा खड़ा हो चुका है। इस बढ़ते अंधेरे को चीरने के लिए भारत को चाहिए था एक ऐसा रडार जो सिर्फ देखे नहीं बल्कि दुश्मन के स्ट्रेंथ को बेअसर कर दे। समयऔर कैलेंडर
अब नेबो यूएम कोई साधारण रडार नहीं है जो भारत के पास है। यह वीएचएफ यानी वेरी हाई फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम पर काम करता है। सबसे बड़ी खासियत इसकी कि लंबी लहरें और बड़ा प्रभाव। जी हां, आधुनिक स्टेल्थ विमान जैसे कि जे 20 या जे 35 इस तरह बनाए जाते हैं कि वे छोटी लहरें यानी एक्स बैंड को सोख लें या फिर बिखेर दें। लेकिन नेबो यूएम की लहरें बहुत लंबी यानी 133, 144 एमए९ होती है। यह लहरें विमान की बाहरी कोटिंग से नहीं टकराती बल्कि विमान के पूरे स्ट्रक्चर जैसे कि उसके पंख, टिल और बॉडी से टकराती हैं। दूसरी खासियत है भौतिकी का नियम। यह बिल्कुल वैसा है जैसे एक बड़ी लहर किसी छोटी नाव को नहीं छोड़ती है। वीएचएफ रडार के लिए स्टेल्थ विमान किसी भी साधारण विमान की तरह साफ दिखाई देते हैं। रूस की अलमाज आंटे कंपनी ने इसे बनाया ही इसलिए था ताकि पश्चिमी देशों के स्टेल्थ विमानों का मुकाबला किया जा सके और अब भारत इसका इस्तेमाल चीन के खिलाफ कर रहा है। बता दें नेबो यूएम की ताकत इसके नंबर्स में छिपी है। यह रडार 600 किमी तक के दायरे में साधारण विमानों, क्रूज मिसाइलों और यहां तक कि बैलेस्टिक मिसाइलों को ट्रैक कर सकता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह 250 से 300 किमी की दूरी पर ही चीनी ख20 जैसे विमानों को पहचान लेता है। इसका मतलब है कि दुश्मन के हमला करने से बहुत पहले ही भारत के पास जवाबी कारवाही का समय होगा। यह रडार मैक 6.4 यानी ध्वनि गति से छह गुना ज्यादा की रफ्तार से आने वाली मिसाइलों को भी ट्रैक कर सकता है। यानी यह हाइपरसोनिक युग के लिए भी तैयार है।
नेबो यूएम अकेले काम नहीं करता। यह भारत के एरोस्पेस डिफेंस कमांड का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अब बात करते हैं भारत के सिस्टम आॅफ सिस्टम्स की जिसका सबसे बड़ा पॉइंट है टारगेट यू इन। नेबो यूएम पहले दुश्मन को दूर से पकड़ता है। इसके बाद आता है डाटा ट्रांसफर। यह डाटा तुरंत र400 ट्रप मिसाइल सिस्टम या हमारे रफाल फाइटर जेट को भेज दिया जाता है। इसके बाद आता है सटीक निशाना। क्योंकि र400 के पास अपनी मिसाइलें छोड़ने के लिए सटीक लोकेशन चाहिए। नेबो यूएम उसे वह अर्ली वार्निंग देता है जो जीत और हार के बीच का अंतर तय करती है। इसके अलावा भारत के स्वदेशी रडार नेत्रा और फोल्कन के साथ मिलकर यह एक ऐसा डिजिटल जाल बुनता है जिससे ड्रैगन का बचना नामुमकिन है। आधुनिक युद्ध में रडार का सबसे बड़ा दुश्मन है एंटी रेडिएशन मिसाइल। लेकिन नेबो यूएम को पकड़ना मुश्किल है। यह बाज 69098 * 8 भारी ट्रकों पर सवार है। यह रडार कुछ ही मिनटों में तैनात हो सकता है और सिग्नल देने के तुरंत बाद अपनी जगह बदल सकता है। इस सूट एंड स्कूट तकनीक की वजह से चीन की मिसाइलें खाली जमीन पर गिरेंगी। जबकि हमारा रडार सुरक्षित दूसरी जगह से दुश्मन पर नजर रख रहा होगा।
भारत द्वारा नेबो यूएम की तैनाती सिर्फ एक खरीद नहीं बल्कि यह एक रणनीतिक बयान भी है। यानी कि स्ट्रेटेजिक स्टेटमेंट। अब आपने यह सब तो समझ लिया लेकिन दोस्तों अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक पुरानी कहावत है। कोई भी देश ना तो स्थाई दोस्त होता है और ना ही स्थाई दुश्मन केवल हित ही स्थाई होते हैं। लेकिन भारत और रूस के रिश्तों में इस परिभाषा को कई बार चुनौती दी गई है। दशकों से बदलते वैश्विक समकर्णों शीत युद्ध के उतार-चढ़ाव और हालिया भू राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद दिल्ली और मॉस्को के बीच का पुल आज भी अडिग खड़ा है। भारत और रूस यानी तत्कालीन सोवियत संघ की दोस्ती की सबसे मजबूत आधारशिला 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान रखी गई थी। जब भारत एक तरफ पाकिस्तान से जंग लड़ रहा था और दूसरी तरफ अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों के दबाव का सामना कर रहा था। तब सोवियत संघ ने भारत के साथ शांति मित्रता और सहयोग की संधि की।

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