गाजियाबाद
लोनी बॉर्डर पर ‘खाकी व आबकारी विभाग की मेहरबानी के चलते धड़ल्ले से चल रहे मयखाने
ढाबों की आड़ में खुलेआम छलक रहे जाम, शाम होते ही बढ़ती है रौनक
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : दिल्ली-उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित लोनी बॉर्डर इन दिनों यातायात और आवागमन के साथ-साथ कथित तौर पर अवैध शराबखोरी के लिए भी चर्चा में है। बॉर्डर थाना और चौकी से कुछ ही दूरी पर विभिन्न नामों से संचालित कुछ ढाबों को लेकर स्थानीय लोगों में चर्चा है कि यहां सुबह से देर शाम तक खाने-पीने के साथ शराब परोसने और पिलाने का सिलसिला लगातार चलता है। शाम ढलते ही इन ‘मयखानों’ की रौनक और बढ़ने की बात कही जा रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बाहर से देखने पर ये दुकाने सामान्य ढाबे नजर आते हैं, लेकिन अंदर का माहौल कुछ और ही कहानी बयां करता है। टेबलों पर शराब की बोतलें खुलने और जाम छलकने की चर्चाएं यहां खुलेआम देखी जा सकती हैं। सवाल यह है कि यहां यह सब खुलेआम हो रहा है तो लोनी बॉर्डर पुलिस और आबकारी विभाग की नजर आखिर इन ढाबों तक क्यों नहीं पहुंच रही?
अखबार की सुर्खियां बनीं, कुछ दिन थमा कारोबार, फिर वही कहानी
बताया जाता है कि पूर्व में भी इस तरह के कथित अवैध कारोबार को लेकर समाचार पत्रों में खबर प्रकाशित होने के बाद कुछ समय तक गतिविधियों पर अंकुश दिखाई दिया था। मगर अब स्थानीय लोगों के अनुसार स्थिति फिर पुराने ढर्रे पर लौटती नजर आ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब आम नागरिक को शाम होते ही ढाबों के आसपास की गतिविधियां दिखाई देती हैं, तो कानून-व्यवस्था और आबकारी की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों को यह सब क्यों नजर नहीं आता?
‘विशेष चश्मे’ से होती है शायद बोर्डर क्षेत्र में निगरानी!
व्यंग्यात्मक तौर पर कहें तो शायद पुलिस और आबकारी विभाग के पास ऐसा ‘विशेष चश्मा’ है, जिससे सड़क पर रेहड़ी लगाने वाला तो तुरंत दिखाई देता है, लेकिन थाने से चंद कदम की दूरी पर कथित रूप से छलकते जाम किसी को नजर नहीं आते।
ढाबों के आसपास खड़ी गाड़ियां, देर शाम तक जुटने वाली भीड़ और शराबखोरी की चर्चाएं यदि स्थानीय स्तर पर इतनी आम हैं तो फिर पुलिस विभाग की स्थानीय निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
‘वरदहस्त’ की चर्चा, अवैध उगाही के आरोपों की भी फुसफुसाहट
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि नए थाना प्रभारी और कुछ जिम्मेदार अधिकारियों की कथित शह के चलते कारोबार दोबारा पुनः अपने पैर पसार रहा है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि बिना लाइसेंस शराब पिलाने का कारोबार वास्तव में चल रहा है तो यह पुलिस और आबकारी विभाग दोनों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
वहीं, स्थानीय लोगों के बीच कथित अवैध उगाही को लेकर भी चर्चाएं हैं। सवाल यह है कि यदि ऐसा कोई खेल चल रहा है तो उसकी जांच कौन करेगा और जिम्मेदारी व जवाबदेही किसकी तय होगी?
पुलिस-आबकारी की ‘चांदी’, जनता के हिस्से में केवल परेशानी
शराब पीकर वाहन चलाने से लेकर सड़क पर विवाद और दुर्घटनाओं तक, खुले में शराबखोरी का असर कानून-व्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं कि ढाबों पर शराब क्यों परोसी जा रही है, बल्कि यह भी है कि जिन विभागों पर इसे रोकने की जिम्मेदारी व जवाबदेही है, वे अब तक क्या कर रहे हैं?
लोनी बॉर्डर पर यदि कथित रूप से अवैध शराबखोरी का कारोबार शाम ढलते ही चरम पर पहुंचता है, तो क्या पुलिस और आबकारी विभाग को इसकी भनक तक नहीं है? या फिर भनक है, लेकिन कार्रवाई करने की इच्छा शक्ति कहीं रास्ते में ही छूट जाती है?
जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सबको दिखाई दे रहा है तो लोनी बॉर्डर पुलिस और आबकारी विभाग को आखिर यह सब दिखाई क्यों नहीं दे रहा?
अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग इन आरोपों की जांच कर कार्रवाई करते हैं या फिर इन अवैध ‘मयखानों’ की महफिल यूं ही सजती रहेगी और सरकारी विभाग अपनी ‘मौन मुस्तैदी’ निभाते रहेंगे।
