गाजियाबाद
लोनी में फिर शुरू हुई ‘नूरा-कुश्ती’, विधायक और पूर्व चेयरमैन आमने-सामने!
एक-दूसरे पर बयानबाजी का दिलचस्प मुकाबला, जनता पूछ रही है इस सियासी तमाशे से हमारी सड़क, बिजली और नाली कब सुधरेगी?
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
लोनी गाजियाबाद : लोनी में सियासत का पुराना खेल एक बार फिर शुरू हो गया है। विधायक और पूर्व चेयरमैन सोशल मीडिया के अखाड़े में आमने-सामने हैं। एक तरफ से बयान, दूसरी तरफ से पलटवार और फिर दोनों ओर से समर्थकों की वाह वाह,मानो लोनी की सबसे बड़ी समस्या विकास नहीं, बल्कि यह तय करना हो कि किसने किसको कितना खरा जवाब दिया।
जनता भी सोच रही है वाह साहब! बिजली जाए तो जाए, सड़क टूटे तो टूटे, नाली बहे तो बहे… लेकिन बयानबाजी की बिजली क्षेत्र में लगातार जलती रहनी चाहिए!
जनता परेशान, सोशल मीडिया पर विकास शानदार!
सबसे बड़ा सवाल यही है कि सोशल मीडिया पर विकास की तस्वीरें और उपलब्धियों का बखान तो खूब दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर स्थानीय लोग अब भी सड़क, जलभराव और बिजली जैसी समस्याओं को लेकर परेशान क्यों हैं?
अगर विकास हुआ है तो जनता को दिखाई क्यों नहीं देता?
अगर बिजली व्यवस्था बेहतर है तो कटौती को लेकर शिकायतें और जनता में आक्रोश क्यों हैं?
और अगर समस्या किसी दूसरे विभाग की है तो जनता की ओर से चुने गए विधायक ने जिम्मेदार अधिकारियों से उसका समाधान कराने के लिए अब तक क्या प्रभावी कदम उठाए?
जनता को यह जानने में शायद उतनी दिलचस्पी नहीं कि विधायक और पूर्व चेयरमैन एक-दूसरे के बारे में क्या कहते हैं। जनता तो बस यह पूछ रही है
“हमारे क्षेत्र की बिजली व्यवस्था कब सुधरेगी?”
नूरा-कुश्ती में दोनों पहलवान खुश, जनता फिर बेचारी!
लोनी की राजनीति में यह नजारा नया नहीं है। समय-समय पर आरोप-प्रत्यारोप की ऐसी कुश्ती शुरू होती है जिसमें दोनों पहलवान एक-दूसरे को पटखनी देने का दावा करते हैं और दर्शक यानी जनता तालियां बजाती रह जाती है।
लेकिन इस कुश्ती का सबसे बड़ा फायदा किसे होता है?
जनता के सवाल पीछे चले जाते हैं और नेताओं के बयान सुर्खियां बन जाते हैं।
एक ने दूसरे की टांग खींची, दूसरे ने पहले की टोपी उछाली लेकिन जनता की टूटी सड़क वहीं की वहीं!
यही तो असली ‘नूरा-कुश्ती’ है।
क्या जनता सच में इस तमाशे से भटक रही है?
अब असली सवाल लोनी की जनता से है।
क्या लोग इन सोशल मीडिया पोस्ट और एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी को विकास का विकल्प मान रहे हैं?
क्या जनता यह देखकर खुश है कि उसके जनप्रतिनिधि एक-दूसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त हैं?
या फिर जनता मन ही मन यह पूछ रही है कि
“भाई, ये सब छोड़ो… बिजली कब आएगी?”
क्योंकि जनता को यह तय करने में शायद कोई खास रुचि नहीं कि सोशल मीडिया पर कौन ज्यादा बड़ा योद्धा है। उसे यह देखना है कि उसके मोहल्ले की सड़क कब बनेगी, पानी निकासी कब सुधरेगी और बिजली संकट का स्थायी समाधान कब होगा।
मीडिया भी पूछे असली सवाल
इस पूरे खेल में स्थानीय मीडिया की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। हर बयान को सुर्खी बना देना आसान है, लेकिन पत्रकारिता का असली काम तब शुरू होता है जब कैमरा नेताओं से हटकर जनता के घरों तक पहुंचे। क्षेत्र में व्याप्त जनसमस्याओं को प्रमुखता से
मीडिया को दोनों नेताओं से एक ही सवाल पूछना चाहिए—
“आपने एक-दूसरे के खिलाफ क्या कहा, यह बाद में बताइए। पहले बताइए जनता की बिजली की समस्या दूर कराने के लिए आपने क्या किया?”
कौन किस पर आरोप लगा रहा है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि कौन समस्या का समाधान कराने के लिए प्रयासरत है।
अगर मीडिया केवल राजनीतिक तकरार दिखाएगा तो नेताओं को भी समझ आ जाएगा कि काम करने से ज्यादा आसान है एक बयान दो, सामने वाले का जवाब लो और फिर अगले दिन सुर्खियां बटोर लो।
अब जनता को तय करना है
लोनी के नागरिकों के सामने अब सवाल बेहद सीधा है
उन्हें ‘बयानबाजी का विकास’ चाहिए या जमीन पर विकास?
उन्हें सोशल मीडिया की उपलब्धियां चाहिए या मोहल्ले में ठीक सड़क?
उन्हें नेताओं की आपसी टांग-खिंचाई देखनी है या बिजली संकट का समाधान?
अगर जनता ने इन सवालों का जवाब मांगना शुरू कर दिया तो शायद सियासी अखाड़े में चल रही यह ‘नूरा-कुश्ती’ अपने आप कमजोर पड़ जाएगी।
क्योंकि जनता को अब यह नहीं देखना कि किसने किसको हराया—जनता यह देखना चाहती है कि उसके सवालों को किसने हराया।
और विधायक जी से जनता का सबसे सीधा सवाल यही है
“विरोधी को जवाब देने में आप कितने सफल हैं, यह सोशल मीडिया बता रहा है; लेकिन जनता की बिजली और बुनियादी समस्याओं का समाधान कराने में आप कितने सफल रहे इसका हिसाब कौन देगा?”

