बागपत
ये कैसी श्रद्धा?” — कांवड़ यात्रा पर सवाल उठाती एक ज़रूरी बहस

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो।
बागपत : श्रद्धा—जिसे हमारी संस्कृति में प्रेम, त्याग, संयम और सहिष्णुता का प्रतीक माना गया है—आज कुछ जगहों पर उन्माद का रूप क्यों ले रही है? यह सवाल हर संवेदनशील नागरिक के मन में उठता है जब वह देखता है कि धर्म के नाम पर किसी का ढाबा तोड़ा जा रहा है, किसी गरीब की ई-रिक्शा रौंदी जा रही है, किसी की गाड़ी तोड़ी जा रही है और आम आदमी के रास्ते बंद कर दिए जा रहे हैं।
कांवड़ यात्रा: आस्था का पर्व या आतंक का?
कांवड़ यात्रा हिंदू धर्म का एक पवित्र आयोजन है जिसमें श्रद्धालु हरिद्वार, गौमुख, गंगोत्री आदि से गंगाजल लेकर अपने-अपने क्षेत्र के शिव मंदिरों तक जल चढ़ाने जाते हैं। यह यात्रा अनुशासन, संयम और भक्ति का प्रतीक रही है। लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह यह यात्रा ‘शक्ति प्रदर्शन’, ‘साउंड शो’, ‘रोड ब्लॉक’ और ‘हिंसक घटनाओं’ का माध्यम बनती जा रही है, वह न केवल धर्म का अपमान है बल्कि देश के कानून और व्यवस्था पर सीधा हमला भी है।
श्रद्धा में हिंसा कहां से आई?
श्रद्धालु वह होता है जो दूसरों की पीड़ा समझे, जो शिव की तरह नीलकंठ बने – ज़हर पी ले लेकिन किसी को कष्ट न दे। लेकिन यदि कोई तथाकथित भक्त किसी दुकानदार का ढाबा जबरन तुड़वा दे, राह चलती ई-रिक्शा को लात मार दे, गाड़ी को तोड़ दे, या पुलिस पर हमला करे, तो यह श्रद्धा नहीं – यह अहंकार है, यह गुंडागर्दी है।
कुछ घटनाएं –
मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, रोहतक, और रुड़की जैसे शहरों में कांवड़ियों द्वारा आमजन की दुकानों, वाहनों और पुलिस पर हमले की घटनाएं सामने आई हैं।
ट्रैफिक को कई किलोमीटर तक जाम कर देना, हॉस्पिटल जाने वाले रास्तों को बंद कर देना, एंबुलेंस तक को रास्ता न देना – क्या यह भक्ति है?
आम आदमी की पीड़ा
इस दौरान सड़कें बंद कर दी जाती हैं, रास्ते अवरुद्ध हो जाते हैं, स्कूल बसें घंटों ट्रैफिक में फंसी रहती हैं। बुजुर्गों, मरीजों और गर्भवती महिलाओं के लिए यह असहनीय यातना बन जाती है। जो लोग रोज़ कमाकर खाते हैं – उनके लिए यह कई दिनों तक भूखे रहने जैसा संकट बन जाता है।
कई जगहों पर तो लोग घरों से बाहर ही नहीं निकल पा रहे, व्यापार ठप हो जाता है, और पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है।
सवाल सरकार से भी
क्या सरकार को केवल वोटबैंक दिख रहा है? क्या एक तरफ की कानून व्यवस्था का उल्लंघन देखकर आंखें मूंद लेना किसी लोकतांत्रिक सरकार के लिए उचित है? क्या धर्म के नाम पर अराजकता बर्दाश्त की जानी चाहिए? और सबसे अहम – क्या यही वो “राम राज्य” है जिसकी कल्पना गांधीजी ने की थी?
धर्म नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
धर्म का मतलब यह नहीं कि आप सड़कें जाम करें, लाठी चलाएं या कानून हाथ में लें। धर्म सिखाता है “अहिंसा परमो धर्मः”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “वसुधैव कुटुंबकम्”। जो दूसरों की तकलीफ को देखकर भी संवेदनहीन हो जाए, वह श्रद्धालु नहीं हो सकता।
समाधान की ज़रूरत
प्रशासन को सख्त निर्देश: श्रद्धा के नाम पर अराजकता करने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
भक्तों को प्रशिक्षण: कांवड़ यात्रा से पहले स्थानीय स्तर पर उन्हें शांति और अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाए।
मार्ग प्रबंधन: यात्रियों के लिए निर्धारित मार्ग और आम नागरिकों के लिए वैकल्पिक मार्ग तय किए जाएं।
धार्मिक संस्थाओं की भूमिका: धर्मगुरुओं को आगे आकर लोगों को संयम और मर्यादा का पालन करवाना चाहिए।
श्रद्धा जब अहंकार बन जाए, तो वह धर्म नहीं, विनाश बन जाती है। अगर शिव की भक्ति करनी है, तो उनके जैसा धैर्य, त्याग और करुणा अपनानी होगी।
वरना सवाल यही उठेगा —
“ये कैसी श्रद्धा?”


