गाजियाबाद

“धारीपुर गांव में विकास की नाव, जलभराव में डूबती मिली”

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो

लोनी गाजियाबाद : लोनी विकास खंड के मुर्तजा बाद भूपखेड़ी गांव के मजरे धारीपुर में इन दिनों गंदगी, जलभराव और जर्जर रास्तों ने ऐसा आतंक मचा रखा है कि लगता है जैसे गांव नहीं, किसी सरकारी लापरवाही का प्रदर्शन स्थल हो।

गांव के सरकारी हैंडपंप दूषित पानी उगल रहे हैं—शायद अधिकारियों ने सोचा होगा कि पानी को भी कुछ नया स्वाद देना चाहिए, आखिर नवाचार का जमाना जो है!

सफाई व्यवस्था ऐसी कि मानो गांव को “स्वच्छता रहित गांव” का पुरस्कार जीतना हो—और वह भी बिना किसी प्रतियोगिता के।

अधिकारियों की चमत्कारी क्षमता
ग्रामीण वर्षों से शिकायत करते रहे, प्रार्थना पत्र देते रहे, गुहार लगाते रहे—
लेकिन अधिकारियों ने भी गजब का धैर्य दिखाया है।
हर शिकायत को अनसुना करने की ऐसी साधना कहीं और देखने को मिले तो बताइए!
शायद वे सोचते होंगे—
“अगर हमारी कुर्सी आराम से चल रही है तो जनता का क्या… वह तो बेचारी चलती ही रहती है।”

ग्राम प्रधान की सूक्ष्म दृष्टि

ग्राम प्रधान की नजरें भी जलभराव पर नहीं पड़ीं।
शायद नजरें ऊपर की तरफ हों—फोटो खिंचवाने या फंड आने की दिशा में।
गांव वाले चाहे कीचड़ में फिसलें या जहर जैसा पानी पिएं, इससे उनके विकास की फोटो पर क्या फर्क पड़ता है?

गांव का हाल–जहां जलभराव बना स्थायी नागरिक
सीमा पत्नी संजय जब ग्रामीणों को काले सिंह मंदिर के पास का हाल दिखाती हैं, तो समझ में आता है कि यहां पानी भी VIP है
न निकालना इसकी शर्त, हर जगह फैलना इसकी आदत।

किसी श्रद्धालु को मंदिर जाना हो या किसी लड़की को इंटर कॉलेज—
दोनों को पहले जलभराव की परीक्षा पास करनी पड़ती है।
जिस गांव में मंदिर और स्कूल के बीच गंदा पानी तालाब जैसा बन जाए, वहाँ स्वच्छ भारत मिशन की आत्मा भी रो पड़े।

ग्रामीणों ने आपस में पैसे जुटाकर रोडे डलवाए—
लेकिन जलभराव ने भी कमाल कर दिया।
जैसे कह रहा हो,
“तुम रोडा डालो, मैं बहा दूँगा—खेलेगा जलभराव!”

विकास कार्यों की कार्ययोजना या फिर अगले साल का बहाना?

हर अक्टूबर में ग्राम पंचायत में कार्ययोजना बनती है।
धारीपुर मुर्तजा बाद भूपखेडी के लोग सोच रहे हैं—
इस बार भी जल निकासी और खड़ंजा सिर्फ कागज पर बनेगा या कभी जमीन पर भी दिखेगा?

अभी तक तो कार्ययोजना की फाइलें ही ज्यादा चल रही हैं, गांव के लोग नही

गांव के लोग वर्षों से जलभराव की समस्या से जूझ रहे हैं।
लेकिन न अधिकारियों की नजर पड़ी, न प्रधान की।
शायद वे इंतजार कर रहे हैं कि
जब पूरा गांव तालाब बन जाए, तब उसे पर्यटन स्थल घोषित कर दिया जाए!

 

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