गोड्डा
केरल जाने वाली बस जब्त,श्रम विभाग ने हंसडीहा पहुंचकर की रजिस्ट्रेशन की खानापूर्ति
मजदूरों का बिना रजिस्ट्रेशन कराए बाहर मजदूरी नहीं करने जाने की दी सलाह
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
*जिला परिवहन पदाधिकारी की कार्यवाही में मजदूरों को केरल ले जाने वाली बस जप्त*
*प्रत्येक बुधवार को हंसडीहा से खुलती है केरल की बसें,पर्यटन परमिट पर बस से मजदूरों को ले जाने का किया जाता है कार्य*
*गांवों व आसपास के क्षेत्रों से दलालों व बस वालों द्वारा किया जाता है मजदूरों को केरल में ठेकेदारों को सौंपने का कार्य*
हंसडीहा/गोड्डा : मजदूरों को केरल ले जाने वाले प्राइवेट बसों का गढ़ बनने के साथ क्षेत्र के मजदूरों के पलायन की खबर प्रकाशित करने के बाद श्रम विभाग ने मजदूरों का रजिस्ट्रेशन करना शुरू किर दिया, जबकि मजदूरों को लाने और ले जाने का कार्य कोराना काल से ही चल रहा था| आज बुधवार के सुबह श्रम अधीक्षक दुमका शैलेन्द्र प्रसाद साह अपने टीम के साथ हंसडीहा पहुंचे और बस के पास पहुंचकर मौके पर मौजूद सभी मजदूरों को रजिस्ट्रेशन किया।
साथ ही मौजूद सभी मजदूरों से रजिस्ट्रेशन कराकर ही बाहर मजदूरी करने जाने की बात कही और बस वालों को भी हिदायत दी गई कि बिना रजिस्ट्रेशन के मजदूरों को बाहर न ले जाया करें। वहीं जिला परिवहन पदाधिकारी दुमका मृत्युंजय कुमार मजदूरों को केरल ले जाने वाली बसों के कागजातों की जांच पड़ताल करने हंसडीहा पहुंचे| जहां केरल से आयी पांच बसों में दो बस को जप्त होने के डर से छुपा दिया गया। तीन बसों की जांचोपरांत एक बस नम्बर AR 01J 0361 में निर्धारित सीटों से अधिक सीटें पायी गयी, जिसे जप्त कर हंसडीहा थाना में सुरक्षारत रखा गया|
जानकारी के अनुसार निर्धारित दिन बुधवार की सुबह केरल से बसें आती है और शाम तक मजदूरों को लेकर केरल चली जाती है| इसमें ज्यादातर गोड्डा व दुमका जिला के महिला मजदूर होती हैं| बसों में सीटों के साथ छेड़ छाड़ कर अलग से पन्द्रह सीट लगायी जाती है| प्रत्येक मजदूर के नाम पर किराए के रूप में मोटी रकम वसूली जाती है| मजदूरों को केरल पहुंचने पर पहले से तय ठेकेदार से रकम लेकर मजदूरों को सौंप दिया जाता है| इसके बाद ठेकेदार अलग अलग जगह पर कारोबारियों व कंपनी में कमीशन के साथ मजदूरों को काम पर लगाता है|
गौरतलब है कि कोराना काल में वैश्विक मजबूरी में आवागमन के बाद अब ये बड़े पैमाने पर कारोबार बन गया है| टूरिस्ट परमिट पर सवारी ढोने का काम करना विभाग के आंखों में धूल झोंकने के बराबर है| साथ मजदूरों की लगातार तीन दिनों की यात्रा भी सुरक्षित नहीं है।




