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कांग्रेस के सभी छह विधायक एक साथ पलट जाएंगे? 

भूत-वर्तमान और भविष्य के साथ आशंका-संभावना समझें

नई दिल्ली। बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से 202 सीटें तो सत्ताधारी राजग के पास हैं। विपक्ष में कांग्रेस के पास छह विधायक हैं, जिनके पलटने की चर्चा बार-बार उठ रही है। तो, क्या सचमुच सभी छह विधायक एक साथ पलट जाएंगे?
बिहार विधानसभा के अंदर सबसे ज्यादा विश्वसनीय स्थिति वामदलों के विधायकों की रहती है। संख्या भले कम हो, लेकिन भटकते-पलटते नहीं। खरमास के दौरान बिहार में कभी राष्ट्रीय जनता दल ने जनता दल यूनाईटेड के विधायकों के असंतोष की बात कही तो कभी सत्ताधारी दलों ने राजद-कांग्रेस के विधायकों के टूटकर आने की गारंटी दी। राजद के 25 विधायक हैं। दल-बदल कानून से बचने के लिए उसके 17 विधायक टूटेंगे या नहीं, इसपर अभी बात नहीं हो रही है क्योंकि संख्या बड़ी है। लेकिन, कांग्रेस की चर्चा खूब है। हर कदम पर कांग्रेस के छह विधायकों की चर्चा हो रही है। हर बैठकी में। दही-चूड़ा पार्टी में भी यह चर्चा का विषय था। पिछली बार कांग्रेस के 19 विधायक बने थे, जिनमें से दो 2024 में टूटकर सत्ता के साथ चले गए थे। इस बार क्या होगा, भूत-वर्तमान और भविष्य के साथ आशंका-संभावना समझें।
कितने विधायक टूटेंगे तो विधायकी नहीं जाएगी-सबसे पहला सवाल यही है कि क्या इस तरह टूटेंगे कि विधायकी भी नहीं जाए। पिछली बार 19 विधायकों में से दो टूटकर सत्ता के साथ चले गए। नियम अपनी जगह रह गया और भारतीय जनता पार्टी कोटे से तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने इनकी मान्यता रद्द नहीं की। विधानसभा कार्यकाल की समाप्ति के समय ऐसे विधायकों ने खुद ही सदस्यता का त्याग किया तो उसे स्वीकार किया गया। खैर, अब इस चुनाव की बात। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस के विधायकों की संख्या छह रह गई। इतने ही जीत सके। अब दल-बदल कानून को देखें तो विधायकी बचाने के लिए दो तिहाई, मतलब छह में से चार का एक साथ निकलना जरूरी है। अगर इससे कम निकलेंगे तो उन सीटों पर उप चुनाव होगा।
पांच पर निशाना, चार को लेकर तैयारी कितनी?-बिहार में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक दलों- जनता दल यूनाईटेड, भारतीय जनता पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास), हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा में से जदयू-भाजपा का इस बात पर जोर है कि विपक्ष के विधायक टूटने वाले हैं। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान भी यह कह चुके हैं। उपेंद्र कुशवाहा अपने ही चार में से तीन विधायकों को साथ बनाए रखने की जद्दोजहद में है। बाकी, एनडीए के दलों के अंदर की चर्चा गरम है कि कांग्रेस के पांच विधायकों पर निशाना है, लेकिन दल-बदल कानून से बचने के लिए चार की गारंटी होने पर ही डील फाइनल होगी। कांग्रेस के लिए ऐसी आशंका और सत्तारूढ़ दलों के लिए ऐसी संभावना पर ‘अमर उजाला’ सामने ला रहा है भूत-वर्तमान, ताकि भविष्य का अंदाजा साफ हो सके।
नेपाल से सटे पश्चिम चंपारण जिले की वाल्मीकिनगर सीट से विधायक चुने गए सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने 2024 में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। इसके पहले वह उपेंद्र कुशवाहा की तत्कालीन पार्टी- राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से जुड़े थे। 2015 में कुशवाहा की पार्टी से चुनाव में उतरे तो तीसरे नंबर पर रहे थे। 2025 के चुनाव में वह 1675 मतों से जीत दर्ज कर सके। अब, कांग्रेस पार्टी और इसके प्रदेश अध्यक्ष से सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा की नजदीकियों को समझें। वह अंतिम बार पार्टी के प्रदेश कार्यालय सदाकत आश्रम अंतिम बार 12 दिसंबर को गए थे। खुद बताया कि कोहरे के कारण देर हो गई तो सदाकत आश्रम में उनकी किसी से मुलाकात नहीं हुई। उन्होंने बताया कि 28 दिसंबर को पार्टी के स्थापना दिवस के अवसर पर प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम से उनकी अंतिम मुलाकात हुई थी।
अभिषेक रंजन वंशानुगत रूप से इस पार्टी से जुड़ाव रखते हैं-पश्चिम चंपारण की ही चनपटिया सीट से विधायक चुने गए अभिषेक रंजन शुरू से कांग्रेसी हैं। वंशानुगत। वंशानुत कांग्रेस भी दूसरे दलों में गए हैं, लेकिन अभिषेक रंजन को ले जाना आसान नहीं है। पिता ओम प्रकाश साह और दादा रामनारायण प्रसाद साह की पहचान भी कांग्रेसी दिग्गज के रूप में रही है। 2020 के बिहार चुनाव में वह जिनसे साढ़े 13 हजार मतों से हारे थे, उन्हें ही 602 मतों से हराकर इस बार विधानसभा पहुंचे हैं। चूंकि, बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम से अलगाव के आधार पर भी पार्टी विधायकों के टूटने की बात हो रही है, तो यह जानना अनिवार्य है कि चनपटिया विधायक उनसे कितने करीब हैं? इस सवाल के जवाब में अभिषेक रंजन ने बताया कि 27 दिसंबर को पार्टी के स्थापना दिवस समारोह में उनसे भेंट हुई थी।
मनोज बिश्वास ने दो पार्टियों के बाद कांग्रेस को कब किया ज्वाइन?-सीमांचल के जिले अररिया की फारबिसगंज सीट से विधायक चुने गए मनोज बिश्वास 2009 से राजनीति में हैं। आधार नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाईटेड का रहा है, हालांकि वह राजद में भी रहे हैं। वह पहली बार 2010 में जदयू के प्रखंड युवा अध्यक्ष बने। 2012 में जदयू में सक्रिय हुए। 2017-18 में जदयू के प्रदेश अति पिछड़ा सचिव बन कर रहे। फिर, 2019 में राजद से जुड़ गए और वहां अतिपिछड़ा प्रदेश महासचिव बने। वर्ष 2023 से 2025 के चुनाव से कुछ दिन पहले तक वह राजद के जिला प्रधान महासचिव रहे। चुनाव से कुछ दिन पहले कांग्रेस की सदस्यता ली और फारबिसगंज विधानसभा से 221 मतों से जीत हासिल कर विधायक बने। वह दावा करते हैं कि 14 नवंबर को जीत के बाद 15-17 बार सदाकत आश्रम जा चुके हैं। लगभग 25 से अधिक बार प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम से मुलाकात की बात करते हुए वह दो दिन पहले मिलने का दावा भी करते हैं।
अबिदुर रहमान वंशानुगत रूप से इस दल के प्रति आस्थावान-अररिया सीट से अबिदुर रहमान पिछले तीन बार से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल कर विधायक बन रहे हैं। उनके दादा ज्यादुर रहमान शुरूआती दौर से ही कांग्रेसी रहे हैं। पिता मोइद्दीन रहमान जोकीहाट से दो बार कांग्रेस के विधायक रह चुके। वह बिहार सरकार के पीएचईडी मंत्री भी रह चुके थे। अबिदुर रहमान से बात नहीं हो सकी, लेकिन उनके करीबी ने बताया कि जीत के बाद चार-पांच बार सदाकत आश्रम जा चुके हैं। दो-तीन बार प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम से मुलाकात हो चुकी है। दो दिन पहले हुई बैठक में भी शामिल हुए थे।
मनोहर प्रसाद सिंह पुलिस सेवा से इस दल के रास्ते राजनीति में आए थे-कटिहार जिले की मनिहारी विधानसभा सीट से मनोहर प्रसाद सिंह कांग्रेस 15168 मतों के अंतर से जीते हैं। राजनीति में इनका भी आधार नीतीश कुमार पार्टी जनता दल यूनाईटेड का रहा है। भागलपुर जिले के मूल निवासी मनोहर प्रसाद सिंह वर्ष 2009 में डीआईजी पद से सेवानिवृति के बाद आवासीय जमीन खरीदकर मनिहारी नगर क्षेत्र में बस गए। मनिहारी विधानसभा क्षेत्र को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाने के लिए वर्ष 2010 में जदयू का दामन थामा। जदयू से मनिहारी विधानसभा चुनाव का टिकट मिला तो एनसीपी प्रत्याशी गीता किस्कू को हराया। वर्ष 2015 में जदयू महागठबंधन में था, तब यह सीट कांग्रेस को चली गई। तब वह कांग्रेस से प्रत्याशी बने। उस बार लोजपा का हराया। 2020 के चुनाव के पहले ही जदयू महागठबंधन से बाहर हो चुका था, लेकिन मनोहर सिंह कांग्रेस में ही रहे और 2020 में इन्होंने नीतीश कुमार की पार्टी के प्रत्याशी को हराया। इस बार, 2025 में भी मनोहर सिंह ने जदयू प्रत्याशी को ही हराया है।
पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे बिहार के किशनगंज विधानसभा क्षेत्र से कमरूल होदा 12794 मतों से जीते हैं। इन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा 2001 में एक मुखिया के रूप में शुरू की थी। फिर, क्षेत्र में लंबे समय तक काम करने के बाद 2019 के विधानसभा उपचुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी (अकटकट) के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की थी। यह बिहार में अकटकट की पहली चुनावी जीत थी। मतलब, उसका खाता कमरूल होदा ने ही खोला था। लेकिन, जब 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव हुआ तो फिर अकटकट के टिकट पर उतरे होदा को तीसरे नंबर से संतोष करना पड़ा। इस चुनाव में किशनगंज से कांग्रेस ने जीत दर्ज की। इसके बाद वर्ष 2023 में होदा राजद में शामिल हो गए। राजद ने उन्हें जिला अध्यक्ष भी बनाया था। पिछले साल चुनाव से पहले, सितंबर में वह राजद छोड़े कांग्रेसी बन गए और तत्कालीन विधायक का टिकट काटकर उन्हें किशनगंज विधानसभा से टिकट दिया गया। इस बार उन्होंने एनडीए की लहर में भी कांग्रेस का परचम लहराया। कांग्रेस पार्टी और प्रदेश अध्यक्ष से नजदीकियां-दूरियां के सवाल पर कमरूल होदा ने बताया कि जब-जब पार्टी की मीटिंग हो रही है, वह जा रहे हैं। 8 जनवरी को भी मीटिंग में सदाकत आश्रम गया और जीत के बाद तीन-चार बार जा चुका हूं। इसमें ही प्रदेश अध्यक्ष से अंतिम मुलाकात हुई थी।
चूड़ा-दही से गायब क्यों रहे? पार्टी छोड़ेंगे क्या?- कांग्रेस पार्टी के चूड़ा-दही भोज में शामिल नहीं होने के बाद इन सभी के पलटने की चर्चा तेज हुई। दूसरी तरफ देखा जाए तो छह में से दो विधायक तो मुसलमान हैं, इसलिए उनका दही-चूड़ा पार्टी में शामिल नहीं होना इतना बड़ा मुद्दा नहीं है। रही बात बाकी चार की तो उन्होंने इसे पार्टी छोड़ने का संकेत मानने से इनकार किया। पांच विधायकों से सीधी बात हुई तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ने की बात को नकार दिया और एक विधायक के करीबी से भी बात हुई तो उन्होंने ऐसे संकेत से इनकार किया। शेष, भविष्य में क्या होगा; यह समझने के लिए इन चारों के भूत और वर्तमान को भी समझना होगा।

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