गाजियाबाद
नन्हे बच्चों पर ऑनलाइन पढ़ाई का बोझ
गाजियाबाद में अभिभावकों व अधिवक्ताओं का बड़ा विरोध, प्रदेश सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग”
स्क्रीन टाइम, मानसिक तनाव और विकास पर असर को लेकर उठी चिंता, Nursery से कक्षा-8 तक ऑनलाइन कक्षाएं बंद करने की मांग
नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
लोनी गाजियाबाद : नाबालिग बच्चों पर बढ़ते ऑनलाइन शिक्षा के दबाव को लेकर गाजियाबाद में अभिभावकों और अधिवक्ताओं ने अपनी गंभीर चिंता जताई है। लोनी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं अधिवक्ता सुरेंद्र कुमार तथा अन्य प्रबुद्ध नागरिकों ने उत्तर प्रदेश शासन को संबोधित प्रार्थना पत्र भेजकर ऑनलाइन कक्षाओं को अनिवार्य रूप से लागू किए जाने का विरोध किया है।
प्रार्थना पत्र में कहा गया है कि जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) गाजियाबाद के निर्देशों के तहत बार-बार भौतिक कक्षाएं बंद कर ऑनलाइन पढ़ाई को लागू किया जा रहा है। यह व्यवस्था विशेषकर छोटे बच्चों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और सामाजिक विकास के लिए हानिकारक साबित हो रही है।
अधिवक्ताओं और अभिभावकों का कहना है कि मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप पर लंबे समय तक पढ़ाई से बच्चों की आंखों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है, साथ ही उनमें चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी और व्यवहारिक बदलाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए प्रत्यक्ष संवाद, खेलकूद और सामाजिक वातावरण बेहद जरूरी है, जो ऑनलाइन माध्यम में संभव नहीं है।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि कोरोना काल के बाद भी प्रदूषण, मौसम और वीआईपी मूवमेंट जैसे कारणों का हवाला देकर स्कूल बंद कर ऑनलाइन शिक्षा को स्थायी विकल्प बनाया जा रहा है, जिससे बच्चे विद्यालयी अनुशासन और सामाजिक सहभागिता से वंचित हो रहे हैं।
प्रार्थना पत्र में संविधान के अनुच्छेद 21, 21-A, 39(f) और 45 का हवाला देते हुए कहा गया है कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और गरिमामय शिक्षा देना राज्य की जिम्मेदारी है। साथ ही “शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009” और नई शिक्षा नीति (NEP-2020) का भी उल्लेख करते हुए बाल-हितैषी और गतिविधि-आधारित शिक्षा पर जोर दिया गया है।
अभिभावकों ने सरकार से मांग की है कि Nursery से कक्षा-8 तक के बच्चों के लिए ऑनलाइन कक्षाओं पर तत्काल रोक लगाई जाए। इसके अलावा, उन्होंने सुझाव दिया कि यदि विशेष परिस्थितियों में स्कूल बंद करना आवश्यक हो तो स्कूल समय में बदलाव, अल्पकालिक भौतिक कक्षाएं या अन्य व्यावहारिक उपाय अपनाए जाएं।
प्रार्थना पत्र में यह भी मांग की गई है कि भविष्य में ऐसे निर्णय लेने से पहले अभिभावकों, शिक्षाविदों और बाल मनोवैज्ञानिकों की राय ली जाए, ताकि बच्चों के हितों के अनुरूप संतुलित नीति बनाई जा सके।
अंत में, प्रार्थीगण ने शासन-प्रशासन से अपील की है कि बच्चों के संवैधानिक अधिकारों और उनके समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए संवेदनशील एवं न्यायोचित निर्णय लिया जाए। शिकायती पत्र पर सुशील डेनियल एडवोकेट, कामना सिंह, जयदीप, राजकुमार व श्रीमती बबीता तोमर एडवोकेट के हस्ताक्षर भी शामिल हैं


