बेतुल
बैतूल पटवारी के प्रतिवेदन पर उठे सवाल
तहसीलदार को गुमराह किए जाने के आरोप, राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली पर फिर खड़े हुए प्रश्नचिन्ह

नेशनल प्रेस टाइम्स, ब्यूरो
बैतूल शहर में लंबे समय से विवादों में रहे पटवारी गोपाल महस्की एक बार फिर चर्चाओं के केंद्र में हैं। उन पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने तथ्यों के विपरीत प्रतिवेदन प्रस्तुत कर तहसीलदार पूनम साहू को गुमराह करने का प्रयास किया है। मामले से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि अपूर्ण या गलत जानकारी के आधार पर कोई प्रशासनिक आदेश जारी किया जाता है तो इससे न केवल संबंधित पक्ष को नुकसान होगा बल्कि उच्च स्तर पर इसकी जांच होने की स्थिति में संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ सकती है। आरोप है कि जिस भूमि का धारणाधिकार पट्टा वैधानिक प्रक्रिया के तहत संबंधित पट्टाधारी को प्रदान किया गया था, उसी भूमि की मौके पर नपाई कर पट्टाधारी को कब्जा दिलाने की कार्रवाई भी राजस्व विभाग द्वारा की गई थी। बताया जा रहा है कि इस प्रक्रिया में पटवारी की भूमिका भी शामिल रही और भूमि का सीमांकन कर उसे पट्टाधारी को सौंपा गया। इसके बावजूद अब उसी भूमि को घास मद की भूमि बताते हुए संबंधित पट्टाधारी को अतिक्रमणकारी करार देने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे पूरे मामले में विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि भूमि वास्तव में घास मद की थी तो पहले उसका सीमांकन कर पट्टाधारी को क्यों दिया गया और यदि पट्टा वैध था तो अब उसे विवादित बताने के पीछे क्या कारण हैं, यह जांच का विषय है। मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि पटवारी द्वारा तैयार किए गए प्रतिवेदन में वास्तविक तथ्यों को पूरी तरह प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके कारण तहसील स्तर पर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि धारणाधिकार के तहत जारी पट्टों की वैधता पर संदेह व्यक्त करना स्वयं राजस्व अभिलेखों और पूर्व प्रशासनिक निर्णयों पर प्रश्नचिन्ह लगाने जैसा है। सूत्रों के अनुसार इस विवाद को लेकर क्षेत्र में लगातार चर्चाएं हो रही हैं और प्रभावित पक्ष न्याय की मांग कर रहा है। मामले की गंभीरता इस कारण भी बढ़ गई है क्योंकि पटवारी गोपाल महस्की का नाम पूर्व में भी विवादों से जुड़ चुका है। आरोप है कि जब वे गोठाना क्षेत्र में पदस्थ थे तब भी भूमि सीमांकन और राजस्व संबंधी मामलों को लेकर कई शिकायतें सामने आई थीं। स्थानीय लोगों का दावा है कि उस दौरान कुछ कॉलोनाइजरों के साथ मिलीभगत कर नाले की भूमि का सीमांकन इस प्रकार किया गया जिससे कई नागरिकों को आर्थिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। बताया जाता है कि शिकायतें बढ़ने पर उस समय तत्कालीन कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी तक मामला पहुंचा था और उन्होंने पूरे प्रकरण की जांच के निर्देश भी दिए थे। हालांकि बाद में यह मामला आगे नहीं बढ़ सका और राजनीतिक हस्तक्षेप की चर्चाओं के बीच जांच की प्रक्रिया ठंडी पड़ गई। अब वर्तमान विवाद सामने आने के बाद पुराने मामलों की भी चर्चा फिर से शुरू हो गई है। जानकारों का मानना है कि यदि किसी राजस्व अधिकारी द्वारा एक ही भूमि के संबंध में अलग-अलग समय पर परस्पर विरोधी प्रतिवेदन दिए जाते हैं तो इससे प्रशासनिक विश्वसनीयता प्रभावित होती है और आम नागरिकों का भरोसा भी कमजोर पड़ता है। प्रभावित पक्ष का कहना है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वास्तविक स्थिति क्या है और किस स्तर पर तथ्यात्मक त्रुटियां हुई हैं। वहीं प्रशासनिक हलकों में भी इस मामले को लेकर चर्चा बनी हुई है और कई लोग मानते हैं कि यदि दस्तावेजों, सीमांकन अभिलेखों, पट्टा आदेशों तथा राजस्व रिकॉर्ड की बारीकी से जांच की जाए तो सच्चाई सामने आ सकती है। इस बीच पत्रकारों द्वारा भी मामले की स्वतंत्र पड़ताल किए जाने की जानकारी सामने आई है। बताया जा रहा है कि राजस्व अभिलेखों, पुराने आदेशों तथा सीमांकन संबंधी दस्तावेजों का अध्ययन कर पूरे घटनाक्रम की तह तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि जांच में सामने आने वाले तथ्यों को जल्द ही प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। क्षेत्र के नागरिकों ने मांग की है कि मामले को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रखकर उच्च स्तरीय जांच कराई जाए ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता, तथ्य छिपाने या गलत प्रतिवेदन देने जैसी स्थितियों की निष्पक्ष समीक्षा हो सके। लोगों का कहना है कि राजस्व विभाग सीधे तौर पर भूमि और नागरिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है, इसलिए ऐसे मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही अत्यंत आवश्यक है। फिलहाल यह मामला प्रशासनिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है तथा सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित अधिकारियों द्वारा आगे क्या कार्रवाई की जाती है और जांच में कौन से तथ्य सामने आते हैं।



